Mar 16 2008
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लगता है कि आजकल सार्वजनिक जीवन में गाली-गलौच का मौसम चल रहा है। वैसे भी हमारी परंपरा में वासंती बयार के चलते और फगुआई बहार के दौरान गाली का आदान-प्रदान लोक व्यवहार का एक अभिन्न अंग बन जाता है। बसंत ऋतु में और विशेषत: फागुन के महीने में श्रांगारिक गीतों...
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वह एक व्याध था। मृगों के पीछे काफी दूर तक दौड़ता चला आया था, पर आज एक भी मृग हाथ नहीं आया। निराश मन से उसने जंगल में एक नजर चारों तरफ डाली और पीछे लौटने ही वाला था कि एक तपस्वी ने टोकते हुये कहा - *वत्स, क्यों इन...
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हिन्दी साहित्य में प्राय: 50 वर्ष की उम्र वाले रचनाकारों को युवा रचनाकार के रूप में देखा जाता है। कवि नरेंद्र पुण्डरीक ऐसे ही रचनाकार हैं, जो पचास वर्ष पूरा कर चुके हैं। अपने दो कविता संग्रहों नंगे पांव का रास्ता एवं सातों आकाशों की लाडली के माध्यम से हिन्दी...
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जब हम देश के रंगमंच पर खडे होकर सांस्कृतिक परिदृश्य पर विहंगम दृष्टिपात करते हैं तो हमारा ध्यान परंपराओं के बिखराव और नयेपन की तलाश पर जाता है। वस्तुत: यदि ध्यान से देखा जाय तो परंपरा जड़ता की दासी नहीं है, नवोन्मेष उसका सहज गुण है। परिवर्तन की चिरन्तर प्रक्रिया...
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*सर्वशास्त्रमयी* व *उपनिषद-सार-सर्वस्व* गीता भारतीय मनीषा का सर्वाधिक अनमोल रत्न है। आध्यात्मिक उन्नयन हेतु इसकी महिमा असंदिग्ध है। स्वयं वेदव्यास *महाभारत* में इसकी उन्मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुये कह उठते हैं - गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै: या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता॥ गीता जीवन जीने की एक कला है। आज...
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गीत को अपना प्राण तत्व, उर्जा एवं सर्वस्व मानने वाले हिन्दी जगत के ख्यातिलब्ध मीमांसक पुरोधा कविवर डॉ. रामसनेही लाल शर्मा *यायावर* का सद्य: प्रकाशित गीत संग्रह *मेले में यायावर* जीवन दर्शन का शुचितावाही रस-निर्झर है जहां मानिनी नायिका के यौवन की मधुमासी छवि छटाएं रसराज के उत्कर्ष का जयघोष...
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संपादक
घनश्यामप्रसाद सनाढय
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