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दस धर्मो की शिक्षा चरित्र को पावन और मनभावन बनाती है

हुकमचंद सोगानी
धर्म से जीवन धन्य होता है। अधर्म जीवन को नगण्य करता है। यदि धर्म के प्रति जिज्ञासा नहीं है तो फिर जीवन आधा-अधूरा ही रहता है। धर्म वहां है जहां अधर्म का अभाव है। धर्म से जीवन का निर्माण होता है। जैन ग्रंथों में धर्म की सार्वभौमिक सत्ता का परिचय दस धर्मो में मिलता है। 1. उत्तम क्षमा, 2. मार्दव, 3. आर्जव, 4. सत्य, 5. शौच, 6. संयम, 7. तप, 8. त्याग, 9. अकिंचन्य, 10. ब्रह्मचर्य।
दस धर्मो का प्रभाव निज स्वभाव को प्रकट करता है। धर्म की प्रभा व्यक्तित्व की आभा को निखारती है। ज्ञान का सतत श्रोत धर्म में निहित है। विडंबना है कि अज्ञान के वशीभूत व्यक्ति संसार में भटकता है। अकूत धन के लोभ में सहज सुख की अनुभूति से वंचित रहता है। यदि हम सुख की तलाश अपने हृदय से प्रारंभ नहीं करते तो सुख को इधर-उधर के भोगों में ढूंढते हैं।
संसार की असारता को समझकर हमें अपने कल्याण का मार्ग पकड़ना है। हम संसार में तो रहें, लेकिन संसार को अपने अंदर न रहने दें। निज स्वभाव को जाने। आत्म सुख को पहचानें। धन-सम्पत्ति से मिली सुविधाओं का सदुपयोग करना सीखें। दान अनेक दुखों का निदान है। दान से जीवन का उत्थान है। संयम सुखों की खान है। गृहस्थ जीवन में अपरिग्रह की दृष्टि नितांत जरूरी है। अत: अपरिग्रही बनें। ज्ञान, धन, रूप, बल आदि का अहंकार हमें छलता है। कर्तव्यनिष्ठ होने के बजाए हम निष्ठुर होने लगते हैं। हमारा अहिंसक स्वभाव हिंसक होने लगता है। नतीजतन हमारे स्वभाव में सद्भाव और सौहार्द का विकास नहीं हो पाता। जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने सदियों पूर्व अहिंसा की महिमा को लोगों के दिलों में प्रतिष्ठित किया था। श्री महावीर द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सूत्रों की व्याख्या करते हुये गांधीजी ने कहा है - मुझे दुनिया को कोई नई चीज नहीं सिखाना है। सत्य और अहिंसा अनादि काल से चले आ रहे हैं। इन पर अमल करते हुये हम अपने विचारों को सकारात्मक स्वरूप दें। सत्य हमारे विचारों और कर्मो से मूर्तिमान होता है। प्रार्थना जैसा सत्य अन्यत्र नहीं है। अहिंसा और मानवता का रक्षक कोई नहीं है।
र्ईष्या, राग-द्वेष, तृष्णा, घृणा तथा स्वार्थ के दायरे में रहकर हम अनायास हिंसा के रास्तों पर चल पड़ते हैं। यद्यपि मनुष्य गलती करता है, लेकिन उन गलतियों को सुधारने का प्रयास भी मनुष्य ही करता है। प्रायश्चित एक प्रकार का तप है। हम अपनी गलतियों के लिए प्रायश्चित करते हुये अपने विचारों को उन्नत करें। इस निमित्त दस धर्मो की शिक्षा हमारा पथ प्रशस्त करती है। हमारे चरित्र को पावन और मन भावन बनाती है।
गुणवान व्यक्ति के संपर्क में जो आता है वह भी गुणी बन जाता है। गुणों पर भरोसा करते हुये हम अवगुणों से बचकर सुखी हो सकते हैं। गुणों की गरिमा से हम कई उपलब्धियों के स्वामी बन सकते हैं। कदम-कदम पर गुणों की अहमियत है। गुण हमें अज्ञान के घेरे से निकालकर ज्ञान की परिधि में ले आते हैं।
हम उन रास्तों पर चलें जो आत्म उत्थान की दृष्टि से उपयोगी हैं। ऐसे अप्रतिम रास्तों का सुपरिचय हमें दस धर्मो की आराधना से मिलता है। बहता हुआ नीर, छूटा हुआ तीर, बोले गये शब्द तथा देह से निकले प्राण वापस नहीं आते। अत: जब सांसें साथ हैं अपने लक्ष्य को प्राप्त करें। जब लोहे में जंग लगने से वह सड़ जाता है तो पारस भी उसे संवार नहीं सकता है। शरीर जीर्ण-शीर्ण स्वभावी है। इंद्रियों के शिथिल होने से पूर्व ही भक्ति मार्ग से अपने उद्धार का मार्ग प्रशस्त करें। इसी में बुद्धिमत्ता है।
या वत्स्वास्थयं शरीरस्य यावच्चेन्द्रिय सम्पद:।
ता वद्युक्तं तप: कर्म वार्धक्ये केवलं श्रम:॥
अर्थात् स्वस्थ शरीर के रहते हुये इंद्रियां जब तक क्रियाशील हैं आत्म कल्याण की दिशा में सार्थक प्रयास कर लेना चाहिए। अन्यथा वृद्धावस्था मेें इंद्रियां शिथिल तथा शरीर अशक्त होने पर पछतावा ही शेष रहेगा। सम्यक दृष्टि जीवन की क्षणभंगुरता को दृष्टिपथ में रखते हुये अपने कल्यण के लक्ष्य को धर्मानुसार देखता है। जबकि मिथ्यादृष्टि भोग-विलास में डूबा रहकर मानव भव का दुरुपयोग करता है। जिनेंद्र देव के नित्य दर्शन और स्वाध्याय से सम्यक दर्शन की प्रतीति होती है। व्यक्ति के जैसे विचार होते हैं वैसा ही आचार दृष्टि गोचर होता है। जैसी आकृति है दर्पण में वैसा ही प्रतिबिंब होता है। जैसी ध्वनि है वैसी ही प्रतिध्वनि सुनाई देती है। जैसा कृतित्व है वैसा ही व्यक्तित्व प्रकट होता है।
हम खाली हाथ आए थे और जो कुछ हमें मिला है वह वैचारिक दृष्टि से कम नहीं है लेकिन दूसरों की प्रगति देखकरर् ईष्या दु:ख का कारण है। तृष्णावृत्ति के वशीभूत कृत्रिम अभाव हमें छलते हैं। पर्यूषण पर्व के अंतर्गत दस धर्मो का ज्ञान हमें इन विषमताओं से उबार सकता है। जब धर्म हमारे साथ होता है तो हम सदैव बहुमत में होते हैं। जबकि अधर्म हमें प्रतिक्षण अल्पमत में रखता है।
तत्वज्ञान की दृष्टि से जैन धर्म के सिद्धांत महान हैं। अधिक बोलना समय का अपव्यय है। कम बोलना शक्ति का संचय है। फूटे बर्तन में कितना भी मजबूत जोड़ क्यों न लगाएं वह जुड़ा हुआ ही कहलाएगा। डोर को तोड़ कर जोडें। ग़ांठ पड़ जाएगी। चरित्र में दोष लगने से निर्दोष कैसे रहेगा? सदोष होगा। पर स्त्री सेवन से लोक जीवन दूषित होता है। ब्रह्मचर्य रहित जीवन शुष्क और पशुवत होता है। पशु स्वभाव से निरंकुश है। मनुष्य के पास स्वेच्छाचारिता के प्रति संयम का अंकुश है। यूं तो इंद्रियों को काबू में रखने से ब्रह्मचर्य का पालन होता है, परंतु शुद्ध ब्रह्मचर्य की दृष्टि से विचारों की मलितना भी मान्य नहीं है। मनुष्य के आहार का प्रभाव उसके विचारों पर पड़ता है। अत: मांसाहार और मदिरापान का त्याग करना चाहिए।
पाप के परिणाम का बोध हमें पापकर्मो से रोकता है। आत्मबोध के जरिए जिंदगी में सुधार की गुजाइश अंतिम सांसों तक है। दूसरों के सम्मान और अपने वजूद की रक्षा के लिए क्षमा करना सीखें। क्षमा का बोध जीवन के प्रति शोध है। परिवार में सुख-समृद्धि और एकता बनी रहे अत: क्षमाभाव को तिरोहित न होने दें। क्षमा हमारे शरीर, स्वास्थ्य और आत्मबल के लिए अनुपम औषधि के मानिंद है। क्षमा की शक्ति पराजित नहीं होने देती। क्षमा के अप्रतिम गुण को अंगीकार कर हम तनावमुक्त सहज जीवन यापन कर सकते हैं। क्रोध शक्ति का दुरुपयोग है। उत्तम क्षमा शक्ति का स्रोत है। दस धर्मो में उत्तम क्षमा का उल्लेख भी मर्मस्पर्शी है।
103, महावीर मार्ग, कलाल शेरी, उौन (म.प्र.) 456006


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