चांदनी बेगम: मानवी संवेदनाओं का उपन्यास
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जिलेदार सिंह
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कर्रतुलऐन हैदर उर्दू साहित्य की नामचीन लेखिका है। कई दशक पहले उनका उपन्यास आग का दरिया अपने क्लासिक अवधारणाओं के कारण प्रसिद्ध हो चुका है। इसी उपन्यास ने उनको हिन्दी पाठकों तक पहुंचाया। यही कारण है कि कर्रतुलऐन हैदर आज तक अपने पाठकों पर अमिट छाप छोड़ चुकी हैं। चांदनी बेगम उनका नया उपन्यास है। प्रस्तुत उपन्यास में लेखिका ने मुस्लिम परिवार में जन्मी चांदनी की जीवन कथा अपने नजरिये से देखने की कोशिश की है। उपन्यास सोलह अध्याय में बंटा है। हर अध्याय में कहानी के नये तंतु हैं जो 'चांदनी' के खस्ताहाल पारिवारिक स्थितियों से कहीं न कहीं जुड़े हैं। कर्रतुलऐन हैदर चांदनी बेगम की कथा सुनाने के लिए पहले एक ऐसी कथा सुनाती हैं जो सामंती है। इसी तरह की कथा प्रसिद्ध उपन्यास लेखक राही मासूम रजा भी सुनाते हैं। अंग्रेजी राज में मुस्लिम जमीदारों की सामाजिक, राजनैतिक स्थिति क्या थी? जैसे-जैसे अंग्रेजों के पैर इस जमीन से उखड़ते गये, वैसे-वैसे मुस्लिम जमीदार भी खत्म होते गये। वास्तव में चांदनी बेगम उपन्यास मुस्लिम जमींदारी के शानोशौकत खत्म होने की कहानी है। यह कहानी अजहर अली से शुरु होती है और कंबर अली तक समाप्त हो जाती है। इस टूटने या खत्म होने की प्रक्रिया में बहुत सारे पात्र हमारे सामने से गुजर जाते हैं। इनमें प्रमुख पुरुष पात्रों में - अजहर अली, कंबर मियां, रघुवीर प्रसाद सिंह, चकोतरा गढ़वाली, विकी मियां, मास्टर मोगरा, भगवानदीन माली, फटकू धोबी, मुंसी सोख्ता, बन्ने चचा, इंदू, अलाउद्दीन, पीरजादा इत्यादि हैं। प्रमुख स्त्री पात्रों में बिट्टो बेगम, अलीमा बानो, बेला, चांदनी बेगम, चमेली बेगम, इलायची खानम्, जरीना, साफिया, जहूरनबुआ, शरबरी, वजीरन, अलहम्दो, बतासन बुआ, बेगम बदरून्निसा इत्यादि हैं। कर्रतुलऐन हैदर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने औपन्यासिक पात्रों के बीच दिखाई पड़ती हें। वे उनके इतने नजदीक हैं कि कभी भी आप उनको अलग करके देख सकते हैं। उनकी मानवीय संवेदनाएं उनके पात्रों में साफ दिखाई देती है। चांदनी बेगम उपन्यास का मुख्य कारण चांदनी है जो ऐसी गरीब लड़की है जिसकी शादी गरीबी के कारण नहीं हो पाती है। एक बिखरे हुये परिवार की दास्तान चांदनी बेगम के जरिए हम सुन या जान सकते हैं। बिट्टो बेगम जो कि दर्दमंद और हरदिल अजीज औरत है उन्होंने चांदनी बेगम की मां अलीमा बेगम से अपने बेटे कंबर अली के लिए चांदनी का हाथ मांग लिया था। जाहिर है अमीना त्यक्ता है विपन्न है। बिट्टो अमीन है। लेकिन दोनों समझदार हैं। इस उपन्यास की जेहन में जो दर्द है-पाकिस्तान उसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। बिट्टो और अलीमा के दुख में पाकिस्तान हरवख्त इजाफा करता रहता है। यदि पाकिस्तान न बना होता तो इतने सारे खाते-पीते मुसलमान रातों-रात पाकिस्तान न भाग जाते। लड़कों की इतनी कमी कतई न होती। अब सवाल यह उठता है कि नई पीढ़ी अपने बुजुर्गो की इच्छाओं का कितना ख्याल रखे। बिट्टो बेगम ने 'चांदनी' से ब्याह वाली बात कंबर अली से बताया होगा? कंबर अली ने बेला के साथ निकाह करने का जो ड्रामा किया और फिर उसके सच में बदलने की जो कोशिश की उसमें कितनी सच्चाई है? क्या आज के मार्क्सवादी सोच वाले ऐसा ही कर रहे हैं? निकाह के नाम पर कंबर की तरफ से दिया जाने वाला 'महर' क्या फर्जी था? जैसा कि बेला से कंबर अली की न पटने पर यह बात सामने आती है। आखिर कौन सी ऐसी चीज थी जिसने बेला से कंबर मियां से शादी करने को मजबूर कर दी? बहुत सारे सवाल लेखिका ने संजीदगी से उठाये हैं। हालांकि उपर से पढ़ने पर पता चलेगा कि कंबर अली अपने जमीदार खानदार में क्रांति करता है कि एक नौटंकी करने वाली की बेटी को अपनी पत्नी बनाता है। याद रहे मुसलमानों में भी हिन्दुओं की तर्ज पर जाति व्यवस्था है। उसी में रहकर ज्यादातर रिश्ते होते हैं। अब आप ही बताइये कि वह कौन सी ऐसी मजबूरी थी जिसने बिट्टो बेगम के मरने के बाद कंबर अली तक 'चांदनी' के रिश्ते की बात नहीं पहुंचने दी। जबकि कंबर अली जाति-पांति , अमीरी-गरीबी से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने अपनी मर्जी का अखबार चला लिया था। उन्होंने लोगों को समझाया था कि डोम, धाडी, मीरासी, भाड़ असल में लोक कलाकार हैं। कोई गरीब नहीं हैं। गरीबी का कारण अमीर लोग हैं। कर्रतुलऐन हैदर मानवीय संवेदनाओं की बड़ी रचनाकार है। उन्होंने इस उपन्यास के जरिए एक गरीब, लाचार मुस्लिम जवान लड़की के दिल में झांककर देखा कि मनुष्य के दिल में कितने रंग होते हैं। जीवन को अच्छा सा जी लेने की कितनी कोमल कामनाएं होती हैं। चांदनी के अंतरमन में कितने उद्गार उठते हैं। एक उदाहरण उसके व्यथित मन का । चांदनी सेहन के कोने में नल की मुंडेर पर बैठी रेल के धुएं की कलौच रगड़-रगड़कर धोती जा रही थी और पट पट आंसू बहा रही थी। इलायची खानम की पुकार सुनकर मंह पर छपके मारे। लाल लाल आंखें किये बावर्ची खाने में गयी। सोना कली के बराबर पटरे पर बैठ गयी। टूटी हुई आवाज में कहा-''मुझे मेज पर से आया हुआ जूठा खाना मत देना।''(चांदनी बेगम-पृ.87) लेखिका को नकली कामरेडों की अच्छी पहचान है। आज इस पार्टी में कुछ ऐसे लोगों का भरावा हो गया है जो मूल विचारधारा से कहीं अलग हैं। कंबर अली का कामरेडी चेहरा पाठकों के दिलो-दिमाग पर अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं है। असल में 'चांदनी' के जीवन में जो दर्द है उसका कंबर जिम्मेदार है। यह बात वह चांदनी के सामने स्वयं स्वीकार करता है - ''हम भी तीन चार साल अपने काम से ऐसे उलझे रहे कि उस मामले का ख्याल जेहन से उतर गया कि जिसका जिक्र अम्मी जनियां ने तुम्हारी वालिदा से किया था। हम भी एक कीमती चीज तह में रखकर भूल गये।'' (चांदनी बेगम-पृ.114) कंबरअली का झूठ साफ दिखाई देता है। यही कारण है कंबर की मृत्यु का उतना पुर असर नहीं करता जितना कि चांदनी का। या इसको यूं भी कहा जा सकता है कि कंबर अली बेला के झांसे में आ गये। उपन्यास के अंशों में बेला एवं कंबर के बीच कहासुनी, लड़ाई-झगड़े से यह बात और भी साफ हो जाती है। चांदनी बेगम का दुख उसकी मन: स्थितियों के कारण और भी असर करता है। कई बार वह अतीत की गहराई में उतरती है और उसी में डुबकी मार-मारकर थक जाती है उसके लिए जैसे सारे रास्ते बंद हैं- एक उदाहरण : ''सारे इंसान मुहरबंद लिफाफे हैं। कोई एक दूसरे के बारे में नहीं जानता। बंद पार्सल! दमपुख्त हंडिया। कुछ पार्सलों के अंदर टाइम बम रखे हैं।'' (चांदनी बेगम-पृ.124) उपन्यास के मध्य से पहले कर्रतुलऐन हैदर की संवेदना इतनी बोझिल होती दिखाई देती है कि चांदनी की कहानी ज्यादा देर तक नहीं सुना सकती। अक्सर उपन्यासों में रचनाकार जिस भी पात्र के साथ रहता है उसके सुख-दुख से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता और यदि वह कहीं से कमजोर होने लगता है या उसके बारे में कहने के लिए शब्द नहीं रह जाते तो वह उसको मार देता है। राही मासूम भी यही करते हैं। चांदनी के साथ भी यही होता है उसके मरने का कारण चश्मा नहीं - ''लिहाफ का आशियां भड़क उठा। हवा के जोर से दरवाजे और खिड़की के पट खुल गये। कमरा आग से भर गया। बिफरे हुये अजगरों की तरह सरसराते फुंफकारते शोले बिट्टो बेगम के ड्रेसिंग रूम में जा घुसे, जहां बेला ने तीन महीने पहले सख्ती से अलहम्दो की मुखालिफत के बावजूद गद्दे-तोशक वगैरह रखवाये थे। मानो रूई के अंबार ने फौरन आग पकड़ ली। छोटे किचन में रखे गैस सिलेंडर फटे। मास्टर बेडरूम धड़ाधड़ जलने लगा। गैर के धमाके में चांदनी बेला, और कंबर की चीखें डूब गयी।'' (चांदनी बेगम-पृ.125) कर्रतुलऐन हैदर ने इन सामाजिक समस्याओं के अलावा आज के समाज में नये भगवानों का मुद्दा भी छेड़ा है। आज हर गली-कूचे में भगवान क्रिकेट खेल रहे हैं, दूध पी रहे हैं, त्रिशूल लपलपा रहे हैं। अब समाजशास्त्रियों को यह खोजना होगा कि वाकई समाज में इतने सारे भगवानों की क्या जरूरत है? क्या सामाजिक समस्याएं इतनी ज्यादा बढ़ गयी हैं कि उनके समाधान के लिए यह सब जरूरी है। उपन्यास का एक सामान्य पात्र चकोतरा गढ़वाली बड़ा भगवान बन जाता है। उसके पुराने दोस्त मास्टर मोगरा की तरफ से गवाही देने की प्रार्थना करते हैं - ''मैंने कहा - फील फरोश ने दावा किया है कि बेला की शादी कंबर अली से हुई ही नहीं थी। आप उस संयोग के वाहिद गवाह हैं क्योंकि आप एक इंटरनेशनल शख्सियत हैं और वेस्ट के भगवानों में से हैं, आप की गवाही सच मानी जाएगी।'' (चांदनी बेगम-पृ.149) चांदनी बेगम उपन्यास की भाषा को लेकर बात की जाए तो लेखिका ने पात्रों के अनुकूल भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में उतार-चढाव है। भाषा के कई रूप दिखाई देते हैं। पात्रों में मालिक की भाषा और नौकर की भाषा में अत्यधिक अंतर है। हिन्दी उर्दू के अलावा इनके पात्र ठेठ अवधी भी बोलते हैं। अवधी का एक उदाहरण दृष्टव्य है। जहूरन बुआ कहती हैं - ''बेगम साहब रूदौली में जहरा बीबी जौन रहीं, बड़ी ही खूबसूरत और नेक। बेचारी अंधी रही। सैयद साहब हू बहुतै हसीन रहे। एक रोज लिल्ली घोडी पर जहरा बीबी के दरवाजे के सामने से गुजरे। इनसे एक कटोरा पानी मांगिन। इ कहिन हम अंधी हैं पानी कैसे लावें? गाजी मियां कहिन - जाओ लेकर तो आओ। इ घड़े से पानी लाई, तो आंखें रौशन। सैयद साहब बहराइच आकर इनके बाप के पास पैगाम भेजिन - बिटिया, बुध के रोज यहां से एक आदमी रूदौली जात हैं।'' (चांदनी बेगम-पृ. 200) कर्रतुलऐन हैदर भारतीय संस्कृति की जानकार हैं। हिन्दू-मुस्लिम, गंगा-जमुनी संस्कृति की पैरोकार हैं। धार्मिक मामलों के किस्से कहानी केवल हिन्दुओं में ही नहीं मुसलमानों में भी हैं। भारतीय मुसलमानों पर हिन्दू कल्चर का प्रभाव जगह-जगह साफ दिखाई देता है। जहूरन बुआ गाजीमियां और जहरा बीबी की शादी की बात करती हैं जो कभी हो नहीं सकी। प्रसिद्ध बहराइच की दरगाह के बाहर क्या-क्या होता है देखिए - ''दरगाह के बाहर दो पलंग बिछत हैं, उन पर आम कभी भी पकें, आम की सीर उर रोज जरूर टपकत हैं....। ठीक सुबह चार बजे पंडित पोथी बांचकर चिल्लात हैं - पचका लग गवा! नक्षत्र में झगड़ा हो गवा। ब्याह अगले साल। यहां भी यही सब होत हैं। बनारस के पंडित आनकर पोथी विचारत हैं। सुबह चार बजे पचका लग जात हैं।'' (चांदनी बेगम-पृ.201) आज भारतीय इतिहास की चीजें लगातार गायब होती जा रही हैं। जगनिक का आल्हाखंड आज गुजरे जमाने की बात हो गयी। मध्यकाल में आल्हा एवं सैयद की दोस्ती हिन्दुस्तान के सारे सामंतों को धूल चटा देती है। हमारा जीवन और कल्चर उसमें साफ-साफ वर्णित है। ऐसे साहित्य का गवैया कलाकार अब हार गया उसकी संताने भूखी हैं। वह कहता है - ''माई बाप! हमारे लड़कपन का ईंटा ढोये पर लगा लीजिए। आपकी दुआ और अल्ला मियां के करम से सात ठो हमार, बाकी चाचा और भैयन के। मेहनत मजूरी करत हैं। लोगन का टीवी चाही, आल्हा नाहीं चाही।'' (चांदनी बेगम-पृ.246) जैसा कि मैने कहा, इस उपन्यास में चांदनी बेगम की कथा कम दूसरी अनेक समस्याओं का वर्णन ज्यादा किया है। कर्रतुलऐन हैदर वर्तमान भारतीय समस्याओं को बखूबी समझती हैं। हिन्दू-मुस्लिम समस्या उसमें सबसे अहम है। भारतीय राजनीति, जातिवाद और धर्मवाद पर टिकी है जो आने वाले समय के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। कुल मिलाकर कर्रतुलऐन हैदर का उपन्यास चांदनी बेगम बेहद पठनीय है। पाठकों के दिल पर इसका असर हुये बिना नहीं रह सकता।
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मु.पो. मालवण, तालुका-कडाना, जिला-पंचमहाल(गुज.)389265
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