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नैतिकता का विकास

डॉ. किरीट जी.जोषी
हम 'नीति' ही धर्म ऐसा शब्द प्रयोग बार-बार करते हैं। यही हमारी संस्कृति है। जब हमारी संस्कृति में न्याय की बात आती है तब ऋषि-मुनियों ने उस बात को धर्म के साथ जोड़कर मनुष्य के पूज्य बने रहे। इसलिए पाप-पुण्य, उन्नति-अवनति इत्यादि विषयों का सारांश नीति और नैतिकता ही निकलता है। तब हमारे मन में सहज ही प्रश्न उपस्थित होता है कि 'नैतिकता' शब्द का अर्थ क्या है? 'नैतिकता' शब्द 'नीति' शब्द से निर्मित हुआ है और 'नीति' शब्द के कई अर्थ हैं। जीवन के विविध क्षेत्रों में चलने के लिए जो सिद्धांत-नियम उपयोगी होते हैं उन सबकी संज्ञा 'नीति' हो जाती है। 'नीति' शब्द का संबंध संस्कृत की 'णीय'धातु के साथ है जिसका अर्थ 'ले जाना' या 'पथ-प्रदर्शन' करना होता है। इस प्रकार धात्वर्थ की दृष्टि से नीति वह है, जो 'ले जाय' या 'आगे ले जाय'। पर यह 'नीति' शब्द का विशालतम अर्थ है और यदि इसे स्वीकार करें तो कला, विज्ञान और वाणिज्य आदि की सारी शाखाएं-प्रशाखाएं 'नीति' के अंतर्गत आ जाएगी, क्योंकि वे मनुष्य को किसी न किसी क्षेत्र में आगे ले जाती हैं।
यदि नीति एवं नैतिकता शब्द की चर्चा हमारे पौराणिक ग्रंथ 'रामायण' और 'महाभारत' के संदर्भ में करें तो ज्यादा सार्थक प्रतीत होगी। 'रामायण' में रानी कैकई राजा दशरथ के पास वचन मांगती है तब राजा दशरथ को भी 'नीति' शब्द की सार्थकता दृष्टिगोचर होती है तथा नैतिकता के कारण ही सीता-त्याग करना पड़ता है। इसी प्रकार महाभारत के धर्मयुद्ध में भी आज हम अनेक पात्रों की नीति-विषयक बातें करते हैं। मामा शकुनि का व्यवहार और कौरवों का छल-कपट अनैतिकता का ही उदाहरण है। युधिष्ठिर के वचन 'नरो वा कुंजरो वा' में भी 'नैतिकता' के विषय में संदेह होता है। ऋषि परंपरा में भी एक शिष्य के रूप में एकलव्य की गुरुभक्ति या गुरु द्रोणाचार्य की नीति के विषय में सबको आश्चर्य होता ही है।
जब व्यक्ति और समाज के बीच न्याय तोलना होता है तब व्यक्ति न्याय-अन्याय के द्वंद्व में फंस जाता है और व्यक्ति के खुद के अस्तित्व के सामने खतरा खड़ा होता है तब भिन्न ही परिणाम प्राप्त होता है।
राजा-महाराजाओं के समय में भी राजनीति और राजाओं की नैतिकता को हम वर्षो के बाद भी याद करके जीवन-मूल्य जीवंत रखते हैं। इतना ही नहीं, उनके नाम से आज भी हम अपने बच्चों के नाम रखते हैं। महाराणा प्रताप, शिवाजी, वीर दुर्गादास जैसे राजाओं ने नैतिकता किसके पास से प्राप्त की। तत्कालीन समय के गुरुओं को याद कर लें - तुकाराम, संत रोहितदास, संत तुलसीदास, एकनाथ, रामदास आदि की तस्वीरें आज भी हमारे घरों में विराजमान हैं।
भारतवर्ष में अंग्रेजों के प्रवेश के बाद नामी-अनामी देशभक्तों की शहीदी में देश के प्रति वफादारी और व्यक्ति की नैतिकता के दर्शन होते हैं। श्यामजी कृष्णवर्मा का देशप्रेम और मातृभूमि केप्रति प्रेम। अंग्रेजों के सामने शहीद भगतसिंह और सुभाषचंद्र की आााद हिंद फौज की रचना तथा ''वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना'' जैसे जीवन-मूल्य में नैतिकता के दर्शन होते हैं।
महात्मा गांधी का जीवन - उनकी आत्मकथा 'सत्य ना प्रयोगो' भी नैतिकता के प्रति सचेत होकर लिखी गयी हो ऐसा प्रतीत होता है। हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ठाठ और पश्चिमी प्रकार का जीवन, अंत में परिवर्तन - मोलीलाल नेहरू की अपने पुत्र के प्रति चिंता, उनका देश की वीरता का दर्शन - उनकी नैतिकता को दर्शाते हैं।
सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी अपनी दीर्घदृष्टि के दर्शन कराते हुये कहा था कि - ''नेताओं और अधिकारियों को भी सामान्य लोगों की तरह रहना चाहिए। उनकी आवश्यकता पहले पूर्ण करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।'' यह सरदार पटेल की नैतिकता को दर्शाता है।
गांधी जी ने कहा था -''भारत आजाद होने के बाद ही नैतिकता की कसौटी होगी। जब सब हमारा हो तब हमारे लोगों के न्याय-अन्याय का विचार होता है। उस समय जातिवाद, धर्मवाद, प्रांतवाद विकास में बाधक न बने तब सबका ख्याल रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।''
वर्तमान समय में कहावतें ही बदल गयी हैं - ''अनीति ही धर्म'' ऐसा लोग कहते हैं। नीति के नाम पर अनीति, धर्म के नाम अधर्म, न्याय के नाम पर अन्याय। कहावत है कि हांथी के दांत दिखाने के और चबाने के और होते हैं। लोगों की मानसिकता बदलती जाती है। आदमी अधिक से अधिक स्वार्थपरायण बनता जाता है। उसका लाभ उठाकर ही अंग्रेजों ने हमारे देश पर लगातार दो सौ साल तक शासन किया था। लोग स्वार्थ और भौतिकता के मद में नैतिकता गवां चुके हैं। वह चाहे व्यापारी, डॉक्टर, मजदूर या किसी भी व्यवसाय के साथ जुड़ा हुआ व्यक्ति हो, उनके फर्ज और नैतिकता में कमी दिखाई देती है।
पैसा (वित्त) ही परमेश्वर हो वहां नीति बेचारी पंगु बन जाती है। मर्ज को जाने बगैर किये जाने वाले ऑपरेशन, कोरे विज्ञापनों से ग्राहकों के सामने धोखेबाजी करते हुये व्यापारी, कम काम करके मालिक को धोखा देने वाले मजदूर, समय व्यतीत करके तनख्वाह लेते हुये गुरुजन। हर क्षेत्र में नैतिकता संकीर्ण बनती प्रतीत होती है। ऐसा होने के पीछे अनेक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। जब राजा प्रजा का न्यायपूर्ण विचार न करे, अधिकारी लोगों के सामने मनस्वी वर्तन करें, मालिक अपने स्वार्थ के लिए मजदूरों का शोषण करे, शिक्षा के क्षेत्र में पारंगत लोगों के स्थान पर अर्द्धज्ञानी लोगाेंं को उच्चपद दिया जाए तब नीतिवान लोगों को अपनी नैतिकता की रक्षा के लिए राजनेताओं, अधिकारियों के सामने संघर्ष करना पड़ता है और लोगों के मुख में से शब्द निकल जाते हैं - ''भगवान बचाओ! तुम ही एक नीतिवान हो, आपके दरबार में देर है अंधेर नहीं!'' इस स्थिति तक तो आदमी अपना अस्तित्व गवां चुका होता है।
लोगों की नैतिकता से देश का मूल्यांकन और विकास का अंदाजा लगाया जा सकता है। हम टीवी, अखबार और सामयिकों में हर चीज का निरीक्षण देख सकते हैं। उस समय हमारे मन में होता है - अभी स्वराज्य, रामराज्य बहुत ही दूर है। अभी स्वराज शेष, अधूरा है।
एस. एम.जे. कॉलेज,
कुतियाणा।


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