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श्रीमद्भगवद्गीता की आज के जीवन में उपयोगिता

डॉ. मृदुल जोशी
'सर्वशास्त्रमयी' व 'उपनिषद-सार-सर्वस्व' गीता भारतीय मनीषा का सर्वाधिक अनमोल रत्न है। आध्यात्मिक उन्नयन हेतु इसकी महिमा असंदिग्ध है। स्वयं वेदव्यास 'महाभारत' में इसकी उन्मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुये कह उठते हैं -
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता॥
गीता जीवन जीने की एक कला है। आज के आपाधापी, उलझन व तनाव भरे जीवन में मनुष्य मात्र को एक स्वस्थ सोच, सम्यक दृष्टि और आशावादी संदेश प्रदत्त करती हुई आदि गुरु शंकराचार्य जी के 'भगवद्गीता किंचित धीता' के उद्धोषा को अक्षरश: चरितार्थ करती है।
मृत्यु प्रत्येक जीवन का अनिवार्य सत्य है और जीवन की राह अत्यन्त जटिल। 'मृत्यु' के सच को बिना किसी घबराहट, अवसाद और निराशा के स्वीकार करते हुये जटिल जीवन को सरलता, निर्लिप्तता, कर्मठता, सजगता, जिजीविषा व समस्त उत्तरदायित्वों को धैर्यपूर्वक वहन करते हुये किस समर्पण व सादगी के साथ जीना है - यह कला सिखाती है गीता। गीता हमें सिखाती है - तन से, मन से, स्वस्थ, सबल व संतुलित होकर जीने का तरीका। क्या यह आज के मानव की सबसे बड़ी आवश्यकता नहीं है?
गीता भक्ति, ज्ञान, कर्म का अद्भुत समन्वय है। मनुष्य सद व विवेकपूर्ण चिंतन के द्वारा उत्कृष्ट कर्म करता हुआ समाज के लिए कितना उपयोगी हो सकता है - इसके सूत्र हमें 'गीता' में सहजता से मिल जाते हैं।
सर्वप्रथम मैं 'स्वस्थ शरीर' पर विचार करूंगी। 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्'। स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ मन का आधार है और स्वस्थ मन ही सकारात्मक उर्जा के माध्यम से सशक्त समाज का निर्माण कर सकता है। गीता में 'शरीर संशुद्धि' के सर्वप्रमुख कारण 'आहार-नियमन' पर सूक्ष्मता से विचार हुआ है। आहार का मन पर प्रभाव असंदिग्ध है। अशुद्ध आहार 'मन' की शांति तरंगों में विक्षोभ उत्पन्न करता है। गीता के 17 वें अध्याय के कतिपय अंश इसके प्रमाण स्वरूप उद्धृत किये जा सकते हैं-
आयु: सत्त्वबलारोग्यसुख प्रीति विवर्धना:।
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहारा: सात्त्विकप्रिया:।
कट्वम्ललवणात्युष्ण तीक्ष्णरूक्ष विदाहिन:।
आहारा राजसस्येष्टा दु:खशोका भय प्रदा:।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्। 1
(आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख, प्रीति बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले, मन को प्रिय लगने वाले भोज्य पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। कड़वे, खट्टे, लवण युक्त, अति गर्म, तीक्ष्ण रूखे, दाहकारक, भोज्य पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं, जो दु:ख चिंता और रोगों को उत्पन्न करने वाले हैं। अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त बासी, उच्छिष्ट, अपवित्र, भोजन तामस पुरुष को प्रिय होते हैं।)
स्पष्टत: 'सात्त्विक पुरुष' को प्रिय लगने वाले भोजन में उन सभी भोज्य पदार्थों की गणना की गयी है जो मनुष्य को दीर्घायु, बुद्धि, आरोग्य व उत्साह प्रदान करते हैं। जिन्हें रसयुक्त, चिकने (दुग्ध-घृतादि)भोजन की संज्ञा से अभिहित किया गया है। यहां इसका भी स्पष्ट उल्लेख है कि राजसी आहार में कड़वे, तीखे, चटपटे, भोज्य-पदार्थ आते हैं जो नाना प्रकार के रोगों, दुखों व भय को आंत्रण देने वाले हैं। 'तामसिक आहार' के अंतर्गत उन सभी त्याज्य भोज्य पदार्थ का वर्णन है जो निश्चित रूप से शरीर-हानि करने वाले हैं। सड़ा-गला, बासी, दुर्गधयुक्त, अपवित्र (संदूषित)भोजन कदापि ग्रहण करने योग्य नहीं है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।(617)
ये विविध प्रकार के भोजन 'जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन' की उक्ति को चरितार्थ करते हुये भिन्न-भिन्न परिणामों को जन्म देने वाले हैं। 'सात्विक आहार' सतोगुण को बढ़ाता है और सतोगुण मन को निर्मल, ज्ञानी और सुखी बनाता है। 2 राजसी आहार रजोगुण की अभिवृद्धि करता है जो मन को चंचल बनाता हुआ नाना प्रकार की कामनाएं उत्पन्न करता हुआ उनकी प्रतिपूर्ति में मनुष्य को संलग्न करता है। 3 'तामसिक आहार' तमोगुण को बढ़ाता है और वह मनुष्य को अज्ञानी, आलसी, प्रमादी व निद्रालु ही बनाता है। 4 इसमें दो राय नहीं कि एक आलसी, प्रमादी व्यक्ति समाज के लिए अनुपयुक्त तो है ही, संघर्ष, हिंसा, कलहकारी परिस्थितियों को जन्म देने वाला भी है।
स्वस्थ शरीर के सूत्र पकड़ा देने के पश्चात गीता 'सूक्ष्म शरीर' व 'मन' को शांत व निर्विकार बनाने के लिए 'प्राणायाम' की शिक्षा भी देती है। 'प्राणायाम' की विधि इस प्रकार वर्णित है-
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेपानं तथापरे।
प्राणापानगती रूद्घ्वा प्राणायाम परायणा:॥ 5
अपान वायु में प्राण वायु का हवन, प्राण वायु में अपान वायु का हवन या प्राण और अपान की गति का निरोध ही प्राणायाम है। आहार के संयमन के साथ प्राणों में प्राण का हवन भी प्राणायाम है। 6
ध्यान (द्वद्गस्रद्बह्लड्डह्लद्बशठ्ठ) एक मन:कायिक, साधना-प्रणाली है, जिसका मानव मन पर अत्यन्त सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 'ध्यान' कैसे किया जाए - इसकी प्रणाली (ञ्जद्गष्ध्दठ्ठद्बह्नह्वद्ग) को भी गीता बताती है -
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरूध्य च।
मर्ध्न्याधायात्मन: प्राणमास्थितो योगधारणाम्।
ओमत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥ 7
सब इंद्रियों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर कर, प्राणों को सहस्रार में पहुंचाकर ऊंकार का उच्चारण ही ध्यान की सम्यक विधि है। प्रणव शब्द का अनवरत उच्चारण व मन का उस शब्द में तादात्म्यीकरण मनुष्य को अद्भुत शांति व सुख के साम्राज्य में ले जा सकता है। आज यह तो सर्वविदित ही है कि 'ध्यान' से मनुष्य में अद्भुत ऊर्जा का संचरण होता है, उसकी क्षमताओं का पुनर्नवीनीकरण होता है और कार्यक्षमता का वर्धन होता है। गीता हमें मानवता का पाइ भी पढ़ाती है। आल समूचे विश्व में जाति व सम्प्रदायगत वैमनस्य का जहर व्याप्त है। सर्वत्र घृणा, अहंकार, नफरत, स्वार्थपरता का तांडव है ऐसे में 'गीता' का यह उद्धोष मानव-मन को सचेत कर देता है -
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गविहस्तिनि।
शुचि चैव स्वपाके च पंडिता: समदर्शिनि:॥ 8
प्रबोधित, प्रचेतस मानस से सबसे पहली अपेक्षा तो यह की जाती है कि वह विनम्र हो, अहंकारी नहीं। साथ ही वह ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते, चांडाल - आशय यह कि सर्वदा सब प्राणियों में समान भाव रखें। जिसे कबीर 'कीरी कुंजर में रह्या समाई' कहकर, तुलसी 'सीय राम मैं सब जग जानी, करउं प्रनाम जोरि जुग पानी' कहकर व बाद के कवि 'हर देश में तू, हर वेष में तू, तेरे नाम अनेक तू एक ही है' कहकर युग की मांग के अनुकू ल साम्प्रदायिक सद्भाव का अलख जगाने का सत्प्रयास कर रहे थे उस उदात्त भाव का निरूपण 'गीता' में बहुत पहले हो चुका था। वह तो सब प्राणियों में अपने समान भाव रखने का सदुपदेश देती है -
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि समदर्शन:।
ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्व मास्थित:।
सर्वथा वर्तमानोपि स योगीमयि वर्तते॥ 9
(जो योगी सबसे समभाव रखता हुआ अपनी आत्मा को ही संपूर्ण प्राणियों की आत्मा में देखता है, जो संपूर्ण भूतों में सबके आत्म रूप ईश्वर को देखता है और समस्त प्राणियों को ईश्वर मय देखता है वह मेरे लिए अदृश्य नहीं है।)
एक अच्छा नागरिक कैसे बना जा सकता है? कैसे विश्व बंधुत्व की परिकल्पना हो सकती है? कैसे मुदिता, प्रेम, करूणा के भाव प्रसारित हो सकते हैं? एक सदभक्त के लक्षण बताते हुये गीता इन्हीं प्रश्नों का निराकरण करती प्रतीत हो रही है -
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करूण एव च।
निर्ममो निरहंकार: सम दु:खसुख: क्षमी॥ 10
अर्थात् मनुष्य को सभी प्राणियों के प्रति मित्रता, करूणा, दया का भाव रखते हुये, क्षमावान, अहंकार रहित व द्वेषभाव न रखने वाला होना चाहिए। उपर्युक्त सद्भक्त के लक्षण ही वस्तुत: एक अच्छे सामाजिक के लक्षण हैं। इसी प्रकार सोलहवें अध्याय में वर्णित दैवी सम्पदा युक्त गुणों के वर्णन में एक योग्य, सम्माननीय व सुसंस्कारित नागरिक के ही लक्षण अन्वेषित किये जा सकते हैं। 11 इसमें संदेह नहीं कि यदि समाज के अधिकांश नागरिकों में धीरता, सहनशीलता, मधुरता, दयालुता, कोमलता, सत्यनिष्ठा व अंत:करण की सरलता का समावेश हो जाए, उनका जीवन द्वेष भाव से विनिर्मुक्त व सादगी से भरा हो जाए तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की कल्पना असंभव-सी नहीं लगती।
संतोष शांति का प्रथम सोपान है। सभी परिस्थितियों में अनुकूलन की क्षमता व्यक्ति को अशांत नहीं होने देती। गीता के चौदहवें अध्याय में 'गुणातीत' पुरुष के लक्षणों के ब्याज से इसी अनुकूलन की आधारभूत अपेक्षाओं को संकेतित किया गया है। 12
गीता नाना प्रकार की इच्छाओं व उसकी पूर्तियों में 'कोल्हू का बैल' बन जाने की दयनीय अवस्था का वर्णन करते हुये उससे व्यक्ति को दूर रहने की सलाह भी देती है। 13
शरीर को मनमाने ढंग से कृश करते हुये धर्म का पाखंड करने वालों पर भी गीता चोट करती है। 14-15 धर्म हमें नाना प्रकार की कामनाओं, मिथ्या दंभ, अहंकार से दूर ले जाता है न कि उसमें लिप्त करता है। 16 अत: अहंकार व दर्प बढ़ाने वाली धार्मिक क्रियाओं को 'गीता' में आसुरी क्रिया की संज्ञा दी गयी है। 17
प्रसन्नतापूर्वक जीवन-यापन की संजीवनी का पान करना है तो गीता का आश्रय ग्रहण कीजिए, जहां कर्तव्य-भाव की तो अपेक्षा है लेकिन फलप्राप्ति की आकांक्षा ही नहीं। 18 जहां प्रत्युपकार की आशा ही नहीं रहेगी, वहीं मनुष्य सुखी, स्वस्थ व प्रसन्न रह सकेगा। अध्याय 17 के दान-प्रसंग में इसी भाव की चर्चा है।
आत्मा के अमरत्व का शंखनाद करती गीता मृत्यु से भयभीत प्राणी को राहत देती है। मृत्यु तो जीवन-नाटक की यवनिका मात्र है, जो दृश्य-परिवर्तन के लिए अनिवार्य है -
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,
नवानि गृह्णाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही। 19
मृत्यु तो नूतन उत्साह, नवल स्फूर्ति व नवीन उर्जा से ईश्वर-प्रदत्त नाटक को पूरा करने के लिए नये वस्त्रों की व्यवस्था है।
गीता एक सद्गृहस्थ अर्जुन को दिया उपदेश है जहां मृत्यु की भयावहता से कर्म क्षेत्र से पलायन करने की संतुति नहीं है। वहां तो नि:संग भाव से पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण मनोयोग, पूर्ण शक्ति से उत्कृष्ट कर्म करने की शिक्षा दी गयी है। गीता में सर्वत्र उल्लास है, उत्साह है, कर्तव्यनिष्ठा है, जीवन का मधुर संगीत है। यह एक योग्य शिक्षक द्वारा योग्य शिष्य को प्रदत्त जीवन जीने की अनूठी शैली है जो आज भी उतनी ही उपयुक्त व अनुकरणीय है। अंतत: हम कह सकते हैं -
यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ 20
यह विजय उत्कृष्ट जीवन जीने की कला ही है।

संदर्भ संकेत -
1. श्रीमदभगवद्गीता, (पदच्छेद-अन्वय और साधारण भाषाटीका सहित)अध्याय 17, श्लोक 8-10, गीताप्रेस गोरखपुर, सं. 2011, एकादश संस्करण, पृ.394-395
2. तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसंगेन बध्ाति ज्ञानसंगेन चानघ। - श्रीमदभगवदगीता, अध्याय 14, श्लोक 6, पृ. 346
3. रजो रागात्मकं विद्वि तृष्णासंगसमुद्भवम्।
तन्निबध्ाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम्।
अध्याय, 14, श्लोक 7, पृ. 346
4. तमस्वज्ञानजं विद्वि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्ाति भारत॥
अध्याय, 14, श्लोक 8, पृ. 437
5. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 29, पृ.126
6. अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
अध्याय 4, श्लोक 30, पृ.126
7. अध्याय 8, श्लोक 12-13, पृ. 207-08
8. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 18, पृ.145
9. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 29-31, पृ.167-171
10. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 12, श्लोक 13, पृ. 315
11. अभयं सत्त्वसंशुद्धिज्र्ञानयोगव्यवस्थित:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शन्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं हीरचापलम्।
तेज: क्षमा घृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 1, 2, 3, पृ. 377
12. समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकांचन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्म संस्तुति:।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।
सर्वारम्भ परित्यागी गुणातीत स उच्यते।
अध्याय 14, श्लोक 24-25, पृ. 356-357
13.(अ.)इदमद्य मयालब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।
अध्याय 16, श्लोक 13, पृ. 383
13.(ब.) अनेक चित्र विभ्रान्ता मोहजाल समावृता:।
प्रसक्ता कामभोगेषु पतन्ति नरकेशुचौ।
अध्याय 16, श्लोक 16, पृ. 384
14. मूढ ग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:।
परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहृतम्।
अध्याय 17, श्लोक 19, पृ. 400
15. कर्षयन्त: शरीरस्थं भूतग्राम चेतस:।
मां चैवान्त: शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयाम्।
अध्याय 17, श्लोक 6, पृ. 393
16. अशास्त्र विहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना:।
दम्भाहंकार संयुक्ता कामरागबलान्विता:।
अध्याय 17, श्लोक 5, पृ. 392
17. श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 17, श्लोक 6, पृ.393
18. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्म फलहेतुर्भू र्माते संगोस्त्वकर्मणि।
अध्याय 2, श्लोक 47, पृ. 67
19. अध्याय 2, श्लोक 22, पृ. 51
20. अध्याय 18, श्लोक 78, पृ. 453

हिन्दी विभाग
कन्या गुरूकुल महाविद्यालय, हरिद्वार


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