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व्यंग्य और आक्रोश के कवि धूमिल

डॉ. भरत पटेल
धूमिल साठोत्तरी कविता के प्रमुख कवियों में से एक हैं। वे पूर्णत: जनवादी कवि हैं। उनकी कविता में समकालीन युगबोध की सच्ची, मार्मिक और तीखी अभिव्यक्ति हुई है। 'संसद से सड़क तक' उनका प्रथम काव्य-संग्रह है, जो 1972 में प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित 'पटकथा', 'मोचीराम', बीस साल बाद' , 'भाषा की रात', 'शहर में सूर्यास्त', 'शांतिपाठ', 'जनतंत्र के सूर्योदय में' जैसी कविताएं बहुचर्चित हैं। उनका दूसरा काव्य-संग्रह 'कल सुनना मुझे' मरणोपरांत सन् 1977 में प्रकाशित हुआ, जिसकी प्रस्तावना डॉ. विद्या निवास मिश्र ने लिखी है। उनका तीसरा काव्य-संग्रह 'सुदामा पांडे का जनतंत्र' भी मरणोपरांत प्रकाशित हुआ।
आजादी के पूर्व भारतीय प्रजा को जो सुनहरे स्वप्न दिखाये गये थे, वे आजादी मिलने के कुछ ही वर्षो में टूटकर बिखरने लगे। कुछ अवसरवादी नेताओं ने सत्ता के सूत्र हासिल कर ऐसी धांधली मचायी कि आम जनता हतप्रभ हो देखती रह गयी। देश की विभिन्न स्थितियों और सामान्य जन-जीवन की दशा-दिशा में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। नेताओं की स्वार्थवृत्ति, मुखौटेबाजी, अवसरवादिता, नारेबाजी, दोगलापन, भ्रष्टाचार जैसी विसंगतियाें ने धूमिल के दिलो-दिमाग को झकझोर दिया। कवि के मन का आक्रोश और झुंझलाहट कविता में तीखी और धारदार अभिव्यक्ति बनकर उभर आयी है। समस्याओं का समाधान जुटाने की बजाय प्रजा का ध्यान दूसरी ओर खींचने तथा झूठे वादे देकर जनता को गुमराह करने वाले नेता-वर्ग पर कवि का यह आक्रोश बिल्कुल वाजिब है-

उसी लोकनायक को
बार-बार चुनता रहा
जिसके पास हर शंका और
हर सवाल का एक ही जवाब था
यानी की कोट के बटन-होल में
महकता हुआ एक फूल
गुलाब का।
वह हमें विश्वशांति और पंचशील के सूत्र
समझाता रहा।
(संसद से सड़क तक-पटकथा, पृ. 111)

स्वार्थ और सत्तालोलुप नेता वर्ग प्रजा को अपनी रैयत न मानकर उसे सिर्फ वोट के रूप में देखता है, जिसकी अधिकतम संख्या उसे कुर्सी पर बिठाती है। इसलिए चुनाव आने से पहले जब वह प्रजा के सामने आता है तो समाज-सेवक का मुखौटा पहनकर नये-नये वादे करता है। धूमिल ने इस पाखंड को बेनकाब कर दिया है -

हां यह सही है कि इन दिनों
मंत्री जब प्रजा के सामने आता है
तो पहले से
कुछ ज्यादा मुस्कुराता है
नये-नये वादे करता है
और यह सब सिर्फ घास के
सामने होने की मजबूरी है।
(संसद से सड़क तक-पटकथा-पृ. 137)

आजादी के कई वर्ष पश्चात् की भारतीय प्रजा अपनी प्राथमिक आवश्यकताएं जुटाने में असफल रही है। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हमारे देश के सूत्रधार हैं। उनकी नरभक्षी जीभ पसीने का स्वाद चख गयी है। इसलिए वे जनता की रोटी के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं। धूमिल ने इस तथ्य का वास्तविक और नग्न चित्र खींचा है -

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं -
यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।
(कल सुनना मुझे - रोटी और संसद-पृ. 66)
'हाथी के दांत खाने को और दिखाने के और' कहावत को सिद्ध करने वाले दोगले नेता स्वराज्य मिलने पर समाजवाद की दुहाई देते थे, लेकिन वही लोग उसका रास्ता रोके हुये थे। समाजवाद के नाम पर उन दिनों काफी शोरगुल हुआ, लेकिन आखिरकार समाजवाद को दफना दिया गया। इन स्थिति को धूमिल ने व्यंग्य-बाण की तीक्ष्ण नोंक से अनावृत कर दिया है -

समाजवाद
उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का
एक आधुनिक मुहावरा है
मगर मैं जानता हूं कि मेरे देश का समाजवाद
माल गोदाम में लटकती हुई
उन बाल्टियों की तरह है जिस पर आग लिखा है।
और उनमें बालू और पानी भरा है।
(संसद से सड़क तक, पटकथा-पृ.139)

महात्मा गांधी के सिद्धांतों और आदर्शो को जीवन में उतारने की बजाय पाखंडी नेता उनका प्रयोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए करते हैं। समारोहों में भाषण देने के लिए जाना होता है, तब गांधीजी के सिद्धांतों की शाल ओढ़कर अपने कालेपन को छिपाने की भरसक कोशिश करने वाले नेताओं की धूमिल ने धाियां उड़ा दी हैं -

और सहसा मैंने पाया कि मैं खुद अपने सवालों के
सामने खड़ा हूं और
उस मुहावरे को समझ गया हूं
जो आजादी और गांधी के नाम पर चल रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा है।
(संसद से सड़क तक, अकाल दर्शन-पृ.18)

भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतांत्रिक देश है। लेकिन हमारे स्वार्थी नेताओं ने ऐसी धांधली मचायी है कि अब धीरे-धीरे प्रजा का विश्वास जनतंत्र से उठता जा रहा है। प्रजा के विकास के नाम पर नेता-वर्ग अपना ही विकास कर रहा है। इस अराजकता पर धूमिल ने भरपूर कशाघात किया है -

ऐसा जनतंत्र है जिसमें
जिंदा रहने के लिए
घोड़े और घास को
एक जैसी छूट है
कैसी विडम्बना है
कैसा झूठ है
दरअसल, अपने यहां जनतंत्र
एक ऐसा तमाशा है
जिसकी जान
मदारी की भाषा है।
(संसद से सड़क तक, पटकथा-पृ. 115)

संसद, विधानसभाओं, अदालतों और बड़े-बडे सरकारी दफ्तरों में जनतंत्र की रोजिंदा सैकड़ों बार हत्या हो रही है। धूमिल की आंखों ने बार-बार यह हत्या होते देखी है। इसलिए उनकी पीड़ा, झुंझलाहट और आक्रोश कविता में तेजाब का रूप धारण कर लेते हैं -

उन्होंने जनता और जरायमपेशा
औरतों के बीच की
सरल रेखा को काटकर
स्वस्तिक चिह्न बना लिया है
और हवा में एक चमकदार गोल शब्द
फेंक दिया है-'जनतंत्र'
और हर बार
वह भेड़ियों की जबान पर जिंदा है।
(संसद से सड़क तक, शहर में सूर्यास्त-पृ. 48)

व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक जगह लिखा है कि 'इस देश के बुद्धिजीवी सब शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं।' (हरिशंकर परसाई: प्रतिनिधि व्यंग्य, करकपल हो गये-पृ.26) इस देश के बुद्धिजीवी लोग भी इस कदर भ्रष्ट और स्वार्थी हो गये हैं कि अपने लाभ के लिए वे अपना मान-सम्मान, ईमानदारी, ामीर सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। भ्रष्ट और लंपट नेताओं की चापलूसी करने वाले और ऊपर की आमदनी की फिराक में रहने वाले टुच्चे बुद्धिजीवियों की धूमिल ने बखियां उधेड़ दी हैं -

वे सब के सब तिजौरियों के
दुभाषिये हैं
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता है। दार्शनिक हैं।
लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।
(संसद से सड़क तक, पटकथा-पृ. 139)

स्वराज्य मिलने के कई वर्षो के बाद भी देश की समस्याओं, प्रश्नों और स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। विदेशी शासकों और स्वदेशी शासकों के शासन में कोई खास फर्क महसूस नहीं होता। हरिशंकर परसाई ने इसे 'ट्रांसफर ऑफ पावर नहीं, ट्रांसफर आफ डिश' कहा है। इस विद्रूप स्थिति से आहत कवि अपने आप से प्रश्न करता है कि क्या किसी आदमी के लिए सैकड़ों लोगों ने बलिदान दिये थे? स्वराज्य का क्या यही मतलब होता है? कवि के शब्दों में -

बीस साल बाद
मैं अपने आप से एक सवाल करता हूं
जानवर बनने के लिए कितने सब्र की जरूरत होती है?
'''''''''''''''''''''
क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुये रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?
(संसद से सड़क तक, बीस साल बाद, पृ. 11)
धूमिल की कविता आम आदमी की कथा-व्यथा से जुड़ी जनवादी कविता है। उन्होंने समाज की विसंगत, विकृत एवं विद्रूप स्थितियों का बारीक निरीक्षण कर उन पर भरपूर व्यंग्य-बाण छोड़े हैं। कविता लिखते समय उनकी दृष्टि कलापक्ष की बजाय अनुभूति की सच्ची, मार्मिक और सचोट अभिव्यक्ति पर रही है। उन्होंने आम आदमी की भाषा के शब्दों में अणु-विस्फोट की ताकत भरकर उन्हें कविता में स्थान दिया है। देश में व्याप्त अराजकता से व्यथित कवि-मन के आक्र ोश ने कविता में विकट व्यंग्य का रूप धारण कर लिया है।

विजयनगर आट्र्स कॉलेज, विजयनगर (साबरकांठा)


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