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सम्पादकीय

आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला

घनश्यामप्रसाद सनाढय
अन्य पिछड़ा वर्ग को उच्च शैक्षिक संस्थाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने संबन्धी केन्द्रिय सरकार के निर्णय पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आखिरकार आ ही गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के निर्णय को मान्य रखा है और खबर है कि अगले शैक्षिक सत्र से इस पर अमल भी शुरू हो जायेगा। यह एक स्वागत योग्य फैसला है। हम समझते हैं कि इस मामले को लम्बे समय तक अनावश्यक रूप से तूल दिया गया और बेमानी संघर्ष को भड़काया गया। आशा की जानी चाहिए कि अब इसके कारण जन जीवन में व्याप्त बैर-भाव और हिंसा-प्रतिहिंसा की परिस्थिति दूर हो सकेगी और शैक्षिक परिवेश कलह के साये से मुक्त रह सकेगा।
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला संपूर्णत: न्यायपूर्ण और संविधान की मूलभूत भावना के अनुरूप है। इतना ही नहीं, यह फैसला बहुत ही संतुलित है और इसमें उभय पक्षों के न्याय-सम्मत हितों को पूर्णरूपेण सुरक्षित रखा गया है। उभय पक्षीय प्रतिक्रियावादी और नकारात्मक आत्यंतिकता का इनकार करते हुए न्यायालय ने दोनों ही पक्षों के साथ न्याय किया है और साथ ही साथ सर्व पक्षीय राष्ट्रीय हितों का जतन और संवर्धन भी किया है। यह हमारी न्याय प्रणाली की संवैधानिक निष्ठा, न्यायिक परिपक्वता तथा उभय पक्षीय निरपेक्षता और तटस्थता का एक ज्वलंत प्रमाण है।
अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण के केन्द्र सरकार के निर्णय को न्यायालय ने मान्य ठहराया है परन्तु इसके साथ ही साथ पिछड़ी जातियों के संपन्न वर्ग को जिसे क्रीमी लेयर या मलाईदार थर कहा गहा है, उसे इसके लाभ से दूर रखने का आदेश भी प्रदान किया है। यह आदेश संविधान की मूलभूत भावना के अनुरूप होने के कारण एक अत्यंत ही सराहनीय आदेश कहा जायेगा।
आरक्षण का संपूर्ण सिद्धांत संवैधानिक दृष्टि से मूलत: समतामूलक समाज की स्थापना के परम उद्देश्य की परिपूर्ति के साधन के रूप में स्वीकृत हुआ है। सामाजिक असमानता इसके लिये कारण रूप है परन्तु सामाजिक असमानता को इसके परिणाम के रूप में स्वीकृत नहीं किया सकता है। सामाजिक असमानता को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त करना आरक्षण का उद्देश्य होना चाहिये, न कि सामाजिक असमानता को यावत् चन्द्र दिवाकरौ बरकरार रखना। पिछड़ा वर्ग के क्रीमी लेयर या मलाईदार थर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखते रहने से सामाजिक असमानता का दायरा निरंतर घटता जायेगा और सामाजिक समानता का दायरा निरंतर बढ़ता जायेगा। आरक्षण के फलस्वरूप जो लोग लाभान्वित हो चुके हैं और उच्च पदों पर आसीन हैं, तथा आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और जिन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त को चुकी है, अर्थात् जो व्यावहारिक रूप से असमानता के दायरे से बाहर निकलकर समानता के दायरे में आ चुके हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर रख कर न्यायालय ने उनके समानता के दायरे में आ जाने पर न्यायिक मोहर लगा दी है। इस प्रक्रिया के चलते एक दिन सामाजिक असमानता की संपूर्ण समाप्ति तथा सामाजिक समानता की पूर्ण स्थापना के संवैधानिक स्वप् के साकार होने की आशा निश्चय ही बलवती होती है। न्यायालय ने प्रति पाँच वर्ष इसकी समीक्षा करने के बारे में जो आदेश दिया है, उसे भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिये।
आरक्षण के कुछ विरोधी समानता का आग्रह करते हुए आरक्षण की संपूर्ण समाप्ति का हठाग्रह करते हैं और दस वर्षों की मूल संवैधानिक समय मर्यादा की दुहाई देते हैं तो दूसरी ओर आरक्षण के कुछ हिमायती आरक्षण को अपना मूलभूत संवैधानिक अधिकार करार देते हुए उसके साथ कभी किसी प्रकार की छेड़छाड़ से परहेज रखने के हठाग्रही हैं। यह दोनों ही प्रकार का हठाग्रह आत्यंतिक है और उभय पक्षीय निहित स्वार्थग्रस्त मानसिकता का कुपरिणाम है। आरक्षण के घोर समर्थक और आरक्षण के धुर विरोधी दोनों ही वर्ग अंतत: सामाजिक समानता के विरोधी और सामाजिक असमानता के पोषक हैं। वैचारिक दृष्टि से दोनों ही वर्ग प्रतिक्रियावादी हैं और इसलिये प्रगति के अवरोधक हैं।
हमारा कर्तव्य है कि हम समतामूलक समाज व्यवस्था की स्थापना के लिये सर्वोच्च न्यायलय के प्रगतिशील फैसले का समर्थन करें और प्रतिक्रियावादी अगड़ों और पिछड़ों के निहित स्वाथपूर्ण प्रचार से प्रभावित न हों।


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