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कविता

कुसुम और कांटे

आचार्य रघुनाथ भट्ट
मेरे नयनों के
इस बगीचे में
उगे हैं
फूल और काँटे
एक साथ।
फूल पारिजात के
गंध बिखेरते हैं
रात भर
सुबह होते ही
भरते हैं गोदी
माँ धरती की।
महक उठती है धरा
समीर बाँटता है धरा
समीर बाँटता गंध को
जीवन के कोने-कोने में
काँटे भी कुछ
कैक्टस के
उगे हैं जो
इनके साथ
लेते हैं वे टक्कर
उनके साथ
जो करते हैं
फूलों के साथ
खिलवाड़।
फूलों को करता मैं
समर्पित
देवताओं के चरणों में
शूलों को लगा देता हूँ
सुमनों की
रखवाली में
फूलों की रक्षा करना
मेरी मजबूरी है
औ, हर गोपी के लिए
एक कन्हैया
णरूरी है।
एन-5, कल्पतरू फ्लेट्स, मीराम्बिका मार्ग,
नारणपुरा, अहमदाबाद-380013


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