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कहानी

नर्गिस

सरला अग्रवाल
स्टेशन के लिए रवाना होने से पूर्व मैंने कई बार रेलवे इन्क्वायरी को फोन करके ट्रेन के आने का समय पूछा था। हर बार यही उत्तर मिला ''ट्रेन राइट टाइम पर आ रही है।''
मुझे विस्मय हुआ था कि अक्सर विलम्ब से आने वाली गाड़ी उसी दिन सही समय से कैसे आ रही है..जल्दी-जल्दी घर का आवश्यक कार्य समेट, भइया-भाभी के लिए लंच पैक कर, मैं ड्राइविंग व्हील पर जा बैठी। बच्चे स्कूल जा चुके थे और अनिमेष अपने कार्यालय।
हमारे घर से स्टेशन की दूरी बीस किलोमीटर के लगभग है, अत: अच्छी स्पीड से गाड़ी दौड़ाती मैं समय पर स्टेशन पहुंची। कुली से सामान उठवा कर, सीढ़ियाँ चढ़कर, ब्रिज पार कर प्लेटफार्म नं. चार पर हमें पहुँचना था।
कुली ने हमारी कोच नं. एस टू के हिसाब से प्लेटफार्म पर सामान रखा ही था कि एनाउंसमेंट होने लगा...''दिल्ली से आने वाली देहरादून एक्सप्रेस निर्धारित समय से आधा घण्टा लेट आने की संभावना है।''
''लीजिए भइया, इतनी दफा इन्हें फोन कर-करके पूछा था, तब नहीं बताया कुछ इन लोगों ने और अब एनाउंस कर रहे हैं कि ट्रेन आधा घंटा लेट आयेगी। मैं सारा घर यूँ ही बिखरा हुआ छोड़कर आई हूँ।''
भइया के मुख पर लाचारगी स्पष्ट थी..फिर भी उन्होंने अपनी खोजी निगाहें चारों ओर दौडाई..एक खाली बैंच दिखाई देते ही कहा, ''चलो वहाँ चल कर बैठते हैं।''
बैंच सामान से अधिक दूर नहीं थी..सामान भी हल्का-फुल्का ही था, आजकल तो सभी लोग कम सामान के साथ यात्रा करना पसंद करते हैं। पर भइया-भाभी की आयु और गिरे स्वास्थ्य के कारण ही कुली करना पड़ा था..वैसे भी सीढ़ियों पर सामान लेकर चलना अब उनके वश की बात नहीं रही थी.. सबने एक-एक अदद उठाया और उस खाली पड़ी बैंच को आबाद कर दिया। एक मिनट की भी देरी हो जाती तो वह बैंच हमारे हाथ नहीं आनी थी, क्योंकि गाड़ी के विलम्ब से आने की बात सुनते ही सभी यात्रियों ने बैठने की जगह ढूंढ़नी आरंभ कर दी थी।
ट्रेन आने का समय हो जाने के कारण प्लेटफार्म पर मची अफरातफरी और भीड़ में होती हलचल धीरे-धीरे शान्त होने लगी। फल, मैगजीन, पूड़ी-सब्जी आदि के ठेले चुपचाप किनारे से लगने लगे..अचानक आया भूचाल मानों ठहर गया हो। आसपास बिखरे सामान को अपने पास खिसका कर मैं भइया-भाभी के बीच में बैठ गई।
''इतने कम समय के लिए आये हैं आप लोग कि जी भर कर बातें तक नहीं हो पाई..हां, सुदेश के कैसे हाल-चाल हैं? काफी समय से उससे मिलना नहीं हो पाया.. पत्र तो वह कभी लिखती ही नहीं है..मैं कभी लिख भी दूँ तो जवाब तक नहीं मिलता।''
''अरे, बहुत ही व्यस्त रहती है वह तो.. एा यूजुअल.. कभी लन्दन तो कभी पेरिस.. कभी चाइना तो कभी थाइलैंड! महीने दो महीने में कहीं बाहर का ट्रिप लग ही जाता है.. विदेशी फ्रैंड्स भी खूब आकर ठहरते हैं उनके यहाँ.. दोनों के ही।'' भाभी ने गर्व से कहा, पर स्वर में करारापन नहीं, शिथिलता थी.. लगा कहीं कोई शूल चुभ रहा हो जैसे।
''और बच्चे?'' मैंने उनके चेहरे पर अपनी खोजी निगाहें जमा दीं।
''बच्चे ठीक हैं.. लड़कियाँ बड़ी हो गई है, स्कूल जाती हैं.. संजीव बहुत सँभालते हैं भइया,'' भाभी ने ऐसे कहा मानों इसमें इसमें भी कुछ राा छुपा हो.. मुझे लगा कि मैंने भाभी की दुखती रग पकड़ ली है...वह बहुत कुछ उगलना चाहती थीं पर कह नहीं पा रही थीं...
''वैसे भाभी, आज के समय में जब स्त्री और पुरूष दोनों ही कमाने लगे हैं और पत्नी को भी इस कार्य के लिए कई घंटे के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है.. यह बहुत जरूरी हो गया है कि पति पत्नी के घरेलू कार्यों में भी पूरा या आंशिक सहयोग करे, क्यों?'' अपनी बात का समर्थन पाने के लिए मैंने अपनी निगाहें भाभी के चेहरे पर डालीं।
''बात तो तुम सही कह रही हो सौम्या, पर कितने प्रतिशत पति यह सोच पाते हैं? मनु महाराज ने स्त्री-पुरूष को काम बाँटते समय अनिवार्य कार्य गन्दगी और झंझट वाले तो सभी स्त्रियाें के हिस्से जो डाल दिये हैं। दिन में दस बार चाय-नाश्ता बनाना हो तो सब स्त्री के सिर, चाहे वह अपने घर में हो या कहीं अतिथि बन कर भी जाये... बच्चे पालने हैं तो स्त्री के सिर, घर की सफाई करनी हो तो स्त्री के सिर...। पति के साथ-साथ बड़े होते बच्चों को भी माँ का सहयोग करना जरूरी है.. अब देखो उनके मात्र चार सदस्यों के परिवार में भी काम को लेकर हर समय तनातनी बनी रहती है। सुदेश की लड़कियाँ उसे तनिक भी सहयोग नहीं देतीं... बड़ी लड़की तृप्ति तो पूरी खँका है... सुदेश से उसकी तनिक भी नहीं बनती।''
''वजह?'' मैंने भाभी से पूछा, मुझे सच में आश्चर्य हो रहा था यह सुनकर। अक्सर बेटियाँ माँ के कहने में रहती है और घर के कामों में माँ का हाथ भी बँटाती हैं। पुत्रियाें की बनिस्बत पुत्र अधिक उच्छंखृल होते हैं।
''अरे वजह कोई एक हो तो बताई जाये.. वह तो बहुत ही तेज लड़की है... घर का काम-वाम नहीं होता उससे! वैसे काम की भी इतनी बात नहीं है, शुरू से ही उसकी माँ से कभी बनी ही नहीं।''
मेरी आंखों में प्रश्नों की लड़ लहराती देखकर भाभी बोलीं, ''अब तुम्हें कैसे समझाऊँ ... हर समय ही महाभारत मचा रहता है उनके घर में। भगवान का दिया सब कुछ है, किसी चीा की कमी नहीं है। सुदेश तो बेहद चिड़चिड़ी हो आई है... एक तो उसके पास 'बाई' तो कोई टिकती ही नहीं है, नौकर वह रखना नहीं चाहती। आजकल के जमाने में दो-दो किशोरियाँ घर में हों और खुद पूरे दिन दोनों को ही बाहर रहना हो तो नौकर कैसे रखे?''
''बाई क्यों नहीं टिकती?'' मेरा सहज प्रश् था।
''वही.. उनका समय पर नहीं आना, हर तीसरे दिन छुट्टी पर बैठ जाना, कई-कई दिनों की छुट्टियाँ बिना पहले से बताये मार लेना, फिर तनख्वाह से एक पैसा भी नहीं कटने देना। तनिक सा भी कुछ समझाओ या डाँटो तो नौकरी छोड़ने की धमकी देना। उनकी बेवजह धौंस-पट्टी सुदेश को बर्दाश्त नहीं होती... वह कहती है ये चोरी और सीनाजोरी नहीं चलेगी मेरे साथ। समय पर आओ, पूरा काम करो और पूरे पैसे लो... सप्ताह में एक दिन छुट्टी लो, पर पहले से ही तय करके जैसे हर रविवार या अन्य किसी एक दिन... यह नहीं कि जब मन आया लगातार चार-पांच दिन के लिए घर बैठ गई बिना खबर भिजवाये। आजकल सभी के यहां टेलीफोन हैं, तुम भी पास के किसी बूथ से फोन करके इत्तला कर दो। पर ये लोग इतनी बातें कहाँ समझती हैं... पैसे काटे और 'बाई' अगले दिन से गायब। फिर नये सिरे से बाई ढूंढ़ो, उसे अपने साँचे में ढ़ालो, काम बताओ, सिखाओ। ऐसे में काम का भार तो बच्चों पर भी आता है। माँ-बाप तो चले जाते हैं अपने-अपने कार्यालय। बच्चे ज्यादा देर घर में रहते हैं। सुदेश बड़ी पुत्री तृप्ति को जो-जो काम दिन में करने के लिए बता कर जाती है, या स्लिप पर लिख कर छोड़ जाती है, वह शाम को घर आने पर किये हुए नहीं मिलते तो घर में घमासान मचता है।
''लड़कियाँ कहतीं हैं हमें माँ न तो कुछ पढ़ाती हैं न बताती हैं, ऊपर से घर का काम और करवाती हैं। हम अपनी स्कूल में दिया होमवर्क पूरा करें या घर में बर्तन माँजे, कपड़े धोयें और खाना बनायें? एक दिन तो मेरे सामने ही सुदेश ने तृप्ति की खूब ही धुनाई की.. गालियाँ दीं। मैंने उसे खूब समझाया कि लड़की अब सयानी हो गई है.. पर वह कहाँ मानने वाली थी, चींख कर गुस्से से बोली, मम्मी आप बीच में मत पड़िए। अब ऐसी बच्चा नहीं है यह, कैसे पटर-पटर जवाब दे रही है? ारा सी कोई बात नहीं सुनती, जरा सी हैल्प नहीं करती किसी काम में भी। संजीव को नाश्ता तक बना कर नहीं दे सकती क्या यह? ऊँट सी बढ़ती जा रही है। हम नहीं काम करते थे इसकी बराबर की उम्र के थे तब, बताओ आप?''
''बेटा, हमारे और तुम्हारे समय में ामीन-आसमान का फर्क आ गया है। तब तुम्हारी माँ नौकरी पर जाती थी क्या? वह तो हर समय घर में तुम्हारे पास रहती थी और हर समय तुम्हार मुँह जोहती रहती थी। नहलाना-धुलाना, नाश्ता, चाय, दूध, खाना, फल सब तुम्हारी माँ समय पर तैयार करके खुद ही तुम्हें दे देती थी। तब तुम्हारे मन में छुट्टी वाले दिन, माँ के बीमार होने पर या कहीं बाहर जाने पर इस बात का चाव सा रहता था कि अपने मन से घर का कोई काम करके हम बड़ों की प्रशंसा पाएँ। पर आज के जमाने में माँ के नौकरी पर घर से अधिकांश समय बाहर रहने के कारण बच्चों पर घर का उत्तरदायित्व एक माबूरी बन कर खड़ा हो गया है। ये नन्हें कोमल फूल हर समय स्वयं को असुरक्षित, उपेक्षित सा महसूस करते हैं... उन्हें अपने स्नेह से सींचने की अपेक्षा तुम उनसे आशा करती हो कि हर दिन, हर समय, हर काम में वह तुम्हारी हैल्प करें।''
''तो नौकरी छोड़ दूँ?'' उसने तैश में आकर पूछा था।
''मैं यह नहीं कह रही हूँ... अब एक जने की कमाई से गुजारा ही कहाँ है बेटा.. महानगरों के जीवन में, आज के उच्च रहन-सहन के स्तर को बनाये रखने के लिए पति-पत्नी दोनों को ही कमाना होगा।''
''यही तो बात है मम्मी, अब यह ढ़ोल तो औरत के गले में पड़ ही गया है।'' वह कुछ स्वर को नीचा करके बोली।
''उसने खुद ही डाला है... और विकल्प ही क्या था उसके पास, अपनी अस्मिता को बचाये रखने के लिए? शिक्षित और आत्मनिर्भर बने बिना वह पुरूष की निगाहों में ठीकरा जो बन गई थी।'' मैंने उससे कहा था
''घर में हर समय मार-डाँट खाती तृप्ति सचमुच इतनी ढ़ीठ बन गई थी कि तुम्हें क्या बताऊॅं सौम्या। मेरा मन तो उन दोनों माँ-बेटी को लेकर बेहद व्यथित और तनावग्रस्त रहने लगा था, पर मैं कर भी क्या सकती थी? जब भी वहाँ जाती हर समय घर में युध्द जैसा वातावरण रहता। ''तूने यह नहीं किया, तूने वह नहीं किया।'' आप मेरी माँ नहीं हो, आपने मुझे जन्म नहीं दिया... आप वर्षा को प्यार करती हो, वर्षा आपकी बेटी है, मैं नहीं''। तृप्ति कहती।
''माँ-बेटी की तू-तू मैं-मैं से संजीव भी परेशान हो उठे थे। पिछले वर्ष तो तृप्ति के हर विषय में मार्क्स बहुत ही कम आये। तब गुस्से में सुदेश ने कहा, मैं अब तुझे होस्टल में भर्ती कराऊंगी तृप्ति, तेरी यही सजा है। वहाँ पर तुझे घर का कोई काम नहीं करना पड़ेगा... न ही मेरी तरह कोई मारने-डाँटने वाला होगा। तब देखूंगी कि तू कितने मार्क्स लाती है। अभी मार्क्स कम आने पर तूने मुझे दोषी ठहरा दिया.. घर के काम का तो बहाना है तेरा, जबकि एक पत्ता भी इधर से उधर नहीं करती तू महा कामचोर लड़की।''
''बस साहब! जुलाई आते ही उसे उन्होंने पिलानी के बढ़िया स्कूल में भर्ती करा दिया। आठवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा में मार्क्स और डिवीजन कम होने के कारण उसे एडमीशन मिलने में कुछ दिक्कत तो हुई, पर एक तो संजीव का शिक्षा विभाग में अच्छा प्रभाव, दूसरे उसके एडमीशन टेस्ट में अच्छे अंक आने के कारण दाखिला मिल ही गया।
तृप्ति को पिलानी भेज कर सुदेश चैन की साँस ली। कहती थी, ''बहुत वर्षों के बाद मैं चैन की नींद सोई माँ, उस नालायक लड़की के रहते तो कभी ठीक से सोना नसीब नहीं हुआ.. ऑफिस से आते ही कोई न कोई ऐसी गड़बड़ कर बैठती थी वह कि आराम हराम हो जाता था।
''बहुत शांति हो गई है घर में उसे होस्टल में भेजने के बाद से... यह तो सच है।'' संजीव ने भी कहा था तब।
जब तृप्ति को भेजे दो तीन माह व्यतीत हो गये तो संजीव ने कहा था,'' अरे सुदेश, खूब हो तुम तो! लड़की को होस्टल भेज कर भूल ही गई, जाकर कभी-कभी उसे सँभालो तो.. वह भी खूब है, वहाँ जाकर न कभी फोन किया, न चिट्ठी-पत्री ही दी। उसने भी सोचा होगा कि चलो अच्छा हुआ पिण्ड छूटा इन मारने-डाँटने वाले माँ-बाप से।''
बड़ी हिम्मत जुटाकर तीन महीने के बाद संजीव पहली बार डरते-डरते तृप्ति की स्कूल आचार्या से मिलने पिलानी पहुंचे। उन्हें भय था कि वहां पहुंचते ही उन्हें प्रिन्सिपल से लड़की के बारे में न जाने क्या-क्या सुनना पड़ेगा। हो सकता है कि कहीं वे उसकी बद्तमीाियों और शैतानियों के कारण उसे स्कूल और होस्टल से निकाल ही दें, पहले भी उसके मार्क्स अच्छे नहीं थे.. और वापसी में उन्हें उसे अपने साथ घर वापस लाना पड़े। सुदेश तो इसी भय के कारण उनके बहुत कहने पर भी साथ जाने के लिए तैयार ही नहीं हुई थी, बोली, ''कौन जाये उस दुष्ट,असभ्य चुडैल के लिए.. जहाँ जायेगी वहाँ से उसकी शिकायतें और बदनामी ही आयेंगी।''
संजीव ने अपना कार्ड चपरासी द्वारा अन्दर प्रिन्सिपल के पास भिजवाया.. और बाहर खड़े रहकर बुलावे की प्रतीक्षा करने लगे। उनके मन में उस समय असीम उद्वेलन चल रहा था.. अनेक विचार आ रहे थे और जा रहे थे। वह स्वयं को हर स्थिति के लिए तैयार कर रहे थे ताकि आने वाले तूफान का सामना धैर्यपूर्वक बिना घबराहट के कर सकें.. न जाने कितनी शर्मिन्दगी उठानी पड़े, क्या-क्या सुनना पड़े उन्हें... पर जब ओखली में सिर दे ही दिया है तो मूसलों का क्या डर। वह यह सब सोच ही रहे थे कि तुरन्त चपरासी वापस आ गया, ''चलिए सर, मैडम आपको बुला रही हैं।''
''ओफ! लगता है उधार खाये बैठी हैं उगलने के लिए सब कुछ, तभी तो उन्होंने तुरन्त ही बुला भेजा'', संजीव ने सोचा और कदम आगे बढ़ा दिये।
संजीव के अन्दर पहुँचते ही प्रिन्सिपल एकदम उठकर खड़ी हो गई मानों उन्हें वे स्टैडिंग ओवेशन दे रहीं हों और गर्मजोशी से स्वागत करते हुए मुस्कुरा कर बैठने के लिए संकेत किया-''अच्छा तो आप हैं मिस्टर संजीव कुमार, तृप्ति के पिता?'' ''पिछली बार तृप्ति के एडमीशन के समय जब आप यहां आये, तब मेरी आपसे भेंट नहीं हो पाई, मैं आउट ऑफ स्टेशन थी।''
इतना सुनते ही संजीव तो हक्का-बक्का से रह गये कि न जाने अब क्या-क्या सुनने को मिलेगा उन्हें उनकी नालायक पुत्री के विषय में। यहाँ आकर भी न जाने क्या-क्या गुल खिलाये होंगे उसने! रोष में आकर होस्टल की न जाने कितनी साथियों की चोटियाँ पकड़-पकड़ कर खींची होंगी, कितने कप-प्लेट चाय बेस्वाद लगने के कारण फेंक कर तोड़े होंगे और कितनी ही बार भोजन खराब लगने के कारण यह गुस्से में बुड़बुड़ करती भूखे पेट सो गई होगी। बाथरूम में नहाने जाती होगी तो उसे घन्टा भर तक बन्द करके अन्दर बैठी रहती होगी, लड़कियाँ द्वार खटखटा-खटखटा कर उसे बाहर निकलने के लिए खुशामद करती रही होंगी। खाना खाती होगी तो मिर्चों वाला या अधिक या कम नमक वाला खाना बनाने के लिए होस्टल के मैस के कुक को सौ-सौ बार कोसती रही होगी। कभी क्लास में झगड़ती होगी, तो कभी होस्टल में! इतनी बदमिजाज लड़की को निभाना क्या कोई हँसी खेल है? वे प्रिसिंपल की भर्त्सना सुनने के लिए मानसिक रूप से स्वयं को तैयार कर ही रहे थे कि उधर से स्वाभाविक स्वर में (व्यंग्यात्मक नहीं) अप्रत्याशित रूप से कहा गया प्रशंसात्मक वाक्य सुनकर एकदम ही चौंक पड़े! मुख उठा कर ऊपर देखा तो प्रिंस्पिल सहजभाव से मुस्कुरा रहीं थीं... उनका चेहरा प्रसन्नता और सराहना के आनंद से पुलकित था... जो वातावरण को सुवासित कर रहा था...
''बड़े सौभाग्यशाली पिता हैं आप मिस्टर संजीव सिंह!'' उन्होंने कहा था।
''जी?'' वह अप्रत्याशित रूप से सकपका उठे.. कहीं यह व्यंग्य तो नहीं... मन में संशय के बादल फिर से घिर आये थे।
''जी हाँ! तृप्ति जैसी हँसमुख, मेधावी बालिका मेरे इन्स्ट्टीयूट में आज तक नहीं आई थी।''
''जी!'' सच कर रहीं क्या आप? वे सचमुच विस्मित थे। क्या सचमुच यह सत्य हो सकता है? तृप्ति और हँसमुख। जो हर समय घर में माँ, छोटी बहिन और नौकरानी के साथ झगड़ती रहती है। तृप्ति और मेधावी? जिसने पिछली वार्षिक परीक्षा में इतने कम अंक प्राप्त किये थे। वैसे भी कभी कोई भी बात उसके भेजे में आसानी से घुसी है क्या? उन्होंने मन ही मन मन सोचा था।
''मिस्टर सिंह! आपकी पुत्री ने आपका ही नहीं हमारे स्कूल का नाम भी रोशन किया है। उसका लिखा और खुद ही डायरेक्ट किया हुआ 'प्ले' आजादी की स्वर्णजयन्ती पर यहाँ सभी स्कूलों में दिखाया गया... अब उसकी वीडियो रिकार्डिंग हो रही है.... आगामी 26 जनवरी को वह दुरदर्शन से प्रसारित होगा। गजब की कवयित्री, गजब की नाटक लेखिका और होनहार नाटक निर्देशिका है वह! उसकी कविताएँ इतनी भावपूर्ण है कि उन्हें सुनकर श्रोताओं के नेत्रों में अश्रु छलछला आते हैं। हँसमुख और विट्टी इतनी है वह, कि सभी उसके साथ वार्तालाप करके स्वयं को धन्य समझते हैं। इस बार के टेस्ट में उसके हर विषय में सर्वोच्च अंक आये हैं। इतनी मेधावी, योग्य और गुणी पुत्री पाने के लिए आप हमारी बधाई के पात्र हैं। सच तो यह है कि ये सब गुण उसमें आपने ही तो विकसित किये हैं।''
''नहीं, नहीं... हमने कुछ भी नहीं किया, यह चमत्कार तो आपने ही किया है।'' संजीव के मुख से अनायास ही निकल पड़ा था।
''ओह बिलीव मी मिस्टर सिंह, योर डॉटर इा ए जीनियस, शी इा ऑलराउण्डर, आई हैव नॉट सीन सच ए लवली ओबीडियन्ट जीनियस चाइल्ड इन माई होल लाइफ! एवरी बडी इन द स्कूल स्टाफ एण्ड होस्टल लव्स हर।'' (मेरा विश्वास कीजिए मिस्टर सिंह, आपकी पुत्री अत्यन्त-मेधावी है, हर फन मौला है। स्कूल की समस्त अध्यापिकाएँ एवं होस्टल के सभी लोग उसे स्नेह -प्यार करते हैं।)
मंत्र मुग्ध से संजीव अवाक् होकर आचार्या जी की बातें सुनते रहे और सोचते रहे कि सचमुच उनके पास रहकर तो देश के एक भावी कर्णधार का शोषण ही हो रहा था। हमने उसे डाँट, मार, घँसो, कान पकड़कर मुर्गा बनाने के अतिरिक्त और दिया ही क्या था? उसकी प्रतिभा, उसके गुण, उसकी मेधा को हम लोगों ने समझा ही कहाँ था, जो उसे निखारने को प्रयास करते! उस समय उनके नेत्रों के समक्ष तृप्ति के यहां आने से कुछ समय पूर्व की घटना साकार हो उठी... उस दिन संध्या साढ़े छ: बजे के प्लेन से लंदन से कुछ अतिथि घर में आने वाले थे। उसी संध्या सुदेश की उसके कार्यालय में एक महत्वपूर्ण मीटिंग बुलाई गई थी। वह लंच में घर आई तो इस विषय में काफी चिन्तित थी। दोनों पुत्रियों के स्कूल से आने पर उसने अपनी यह समस्या उनके सम्मुख रखी और उन्हें हिदायत दी कि वे अतिथियों का ध्यान रखें। उन विशिष्ट अतिथियों को विशेष रूप से चाय नाश्ता स्वयं करवायें तथा बाई से खाना बनवाकर आदरपूर्वक परोसें।
बाई पार्टटाइम थी। वह खाना बनाकर चली जाती थी। इस पर तृप्ति एकदम उबल पड़ी थी। ''मम्मी आपके गेस्ट्स, को यह कैसे विदित होता है कि कल तृप्ति का टैस्ट है। कल मेरा फिािक्स का टैस्ट है, होमवर्क भी ढ़ेर सारा मिला है, टेस्ट के लिए पढ़ाई भी करनी है।'' वह मचल पड़ी थी।
''अब जब गैस्ट आ रहे हैं तो उन्हें अटैण्ड तो करना ही है न? मेरी आज एक अर्जेन्ट मीटिंग रखी गई है, बहुत ही जरूरी , उसे बीच में छोड़ कर तो मैं आ नहीं पाऊंगी.. हो सकता है कि मुझे आने में रात में दस-ग्यारह ही बज जायें... छ: सात बजे तो मीटिंग शुरू ही होगी। बाहर से कई लोग आ रहे हैं, कर लेना बेटा...प्लीज!''
''माँ, आपके तो राो ही कोई न कोई गेस्ट आते हैं और आप सारा काम मुझ पर ही छोड़ देतीं हैं। मेरी स्कूल की रिपोर्ट हर बार बिगड़ जाती है।'' वह भुनभुना पड़ी।
सुदेश ने आव देखा न ताव, झट से एक झन्नाटेदार तमाचा उसके कोमल गालों पर रसीद कर दिया। ''कितना भी प्यार से बात करो, रिक्वेस्टिंग मैनर में कहो तब भी यह लड़की अपनी ही चलाती है, बड़ी आई.ए.एस. की पढ़ाई कर रही है न?''
''पढ़ाई तो पढ़ाई है! चाहें जिस भी कक्षा की क्यों न हो! आप हमेशा मुझे ऐसे ही दबाती रही हैं। मुझे कभी प्यार नहीं करतीं, बस नौकरानी की तरह ट्रीट करती है... बल्कि उससे भी खराब! उसे थोड़ी न तमाचा मार सकती हैं, वह तो कल से आना ही बंद कर देगी, पर मैं तो यहीं रहूंगी न, इसी घर में... इसलिए मुझसे मन चाहा काम कराती हो, डाँटती-डपटती हो। देख लेना एक दिन मैं भी घर छोड़कर चली जाऊंगी। नहीं करूंगी मैं आज तुम्हारा कोई काम, कर लो क्या करोगी। खुद की मीटिंग छोड़ो न?'' वह रो-रोकर कहती रही थी।
उस दिन अच्छा खासा हंगामा हो गया था उनके घर में। यों ऐसी बातें नयी नहीं थी। अक्सर ही यह सब होता था और अंत में तृप्ति को ही पढ़ाई छोड़कर घर के काम की बागडोर सँभालनी पड़ती थी। उस बार भी तृप्ति के सांइस में काफी कम अंक आये थे। वह रात को ग्यारह बजे तक अतिथि सत्कार में लगी रही थी। सुबह छ: बजे तो उनकी स्कूल बस लेने आ ही जाती थी।
तभी उन्हें यहां आने से पूर्व की बात स्मरण हो आई। यहाँ आने का कार्यक्रम बनाते समय उन्होंने सुदेश से कहा था, तुम भी चलो अपनी बेटी को देख-सँभाल आओ, पुत्रियों को माँ से अधिक प्रेम होता है। वहाँ पर उसकी सहेलियों, होस्टलर्स एवं अध्यापिकाओं से मिलकर यथार्थ का पता तुम ज्यादा अच्छी तरह लगा पाओगी। इस पर सुदेश ने तुनक कर बेरूखी से कहा था, न बाबा न! मुझे पहले से ही मालूम है कि वहाँ जाकर क्या होना है... सारी की सारी होस्टलर्स, वॉर्डन और टीचर्स जली-भुनी बैठी होंगी... बर्र के छत्ते में हाथ देने चलूँ? उस ढीठ और कामचोर लड़की ने जो ख्याति अर्जित की होगी मुझे सब विदित है।''
काश! वह मेरे साथ यहां आई होती और अपने कानों से प्रिंसिपल की बातें सुनी होती!
तभी ''मे आई कम इन मैडम,'' एक विश्वास भरा स्वर कमरे के बाहर से उभरा।
''कम इन, कम इन!'' माई स्वीट चाइल्ड!'' प्रिन्सिपल ने मुस्कुराते हुए बड़ी गर्मजोशी के साथ कहा। संजयसिंह के वहां आते ही प्रिंसिपल ने चपरासिन को तृप्ति को बुलाने के लिए भेज दिया था।
तृप्ति कमरे में आकर प्रिंसिपल के सामने खड़ी हो गई, ''यस मैडम, आपने मुझे बुलवाया?'' उसने अत्यन्त नम्रतापूर्वक पूछा। प्रिंसिपल ने संकेत से उसका ध्यान उसके पिता की ओर खींचा। तृप्ति ने आश्चर्य से देखा कि उसके सामने कुर्सी पर तो वहां उसके पापा बैठे हैं।
''पापा!'' वह उनके पास आकर सटकर खड़ी हो गई। संजयकुमार ने उठकर पुत्री को गले से लगा लिया। ''कैसी है?'' उन्होंने प्यार से पूछा।
''अच्छी!'' तृप्ति मुस्कुरा पड़ी।
''तृप्ति अपनी कक्षा की मॉनीटर और प्राक्टर भी है'' प्रिंसिपल ने संजय को बताया।
''सच!'' उन्होंने खुश होकर तृप्ति की ओर देखा।
''अत्यन्त प्रतिभाशाली है आपकी पुत्री, सर्वगुण संपन्न!''
सच ही तृप्ति की तो वहाँ आकर दुनिया ही बदल गई थी। उसके मुख कर गजब का तेज, आत्मविश्वास, लावण्य और प्रसन्नता का महासागर लहराने लगा था। इतनी ताागी, सौम्यता और प्रसन्नता इससे पूर्व उन्होंने कभी तृप्ति के मुख पर नहीं देखी थी.. वह जन्नत का फरिश्ता लग रही थी... छोटी सी, प्यारी सी परी... कहीं वह अपने परिलोक को उड़ तो नहीं जायेगी? कितना परिवर्तन आ गया है इन चंद महीनों में ही, उनकी पुत्री में हैरान थे। अनायास ही उन्हें एक प्रसिध्द शायर की पंक्तियाँ याद हो आई ''हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है, हुआ नहीं अभी तक चमन में दीदावर पैदा।''
इतना कह कर भइया और भाभी तृप्ति के प्रति गर्वान्वित हो मुस्कुराने लगे थे।
''तो यह हुआ'', भाभी ने ठहाका लगा कर कहा।
''कमाल हो गया'' मैंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।
तभी शोर मच उठा था...ट्रेन आ गई, ट्रेन आ गई। प्लेटफार्म पर हलचल मच गई...बैठे हुए, लेटे हुए लोग उठकर खड़े हो गये और अपना सामान संभालने लगे...भइया-भाभी ने मुझे अपने गले से लगाते हुए कहा, ''अच्छा, खूब ही आनन्द आया तुम्हारे पास आकर... अब तुम आना समय निकाल कर, ठीक है न?''
''हां भइया! भाभी आप जाते ही फोन अवश्य कर दीजिएगा, मुझे चिन्ता बनी रहेगी। चिट्ठी भी लिखियेगा। चिट्ठी का अपना महत्व है... उसे सहेज कर रखा जा सकता है।''
''अच्छा बाय! कह कर वे सामने खड़ी ट्रेन में अपना कम्पार्टमेंट ढूंढ़ने लगे।''
''आस्था'' 5-बी-20, तलवंडी,कोटा-324005 (राजस्थान)


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