Taptilok | Hindi Literary Magazine published from Surat, Gujarat, India. | Add to favorites
सम्पादकीय ताप्ती प्रवाह कविता कहानी लघुकथा व्यंग ललित निबंध
साहित्य विचार संस्कृति चिंतन जीवन विवेक ग्रंथावलोकन समाचार यात्रा-वृत प्रतिभाव
लोकतेज देश - दुनिया के ताजा समाचार
जीवन विवेक

धन साध्य नहीं, साधन है

आचार्य श्री महाप्रज्ञ
एथिक्स बहुत जटिल प्रश्न है। इसलिए है कि आज का सारा चिंतन पदार्थ जगत के साथ जुड़ा है। चेतना को आज बिल्कुल इग्नोर किया जा रहा है। जब तक चेतना और पदार्थ-इन दोनों को साथ में रखकर चिंतन नहीं करेंगे, समस्या का समाधान संभव नहीं लगता। इस विषय में भगवान महावीर का वचन है-''जे अज्झत्थं जाणइ ते बहिया जाणइ। जे बहिया जाणइ ते अज्झत्थं जाणइ।'' जो अध्यात्म को जानता है वह वाह्य जगत को जानता है, जो वाह्य जगत को जानता है वह अध्यात्म को जानता है। इसे आज की भाषा में कहें तो ''वन हू नोज द स्पिरिचुअल वर्ल्ड, नोज द मेटेरियल वर्ल्ड।'' अब इसका उल्टा करें तो कहा जाएगा-''वन हू नोज द मेटेरियल वर्ल्ड, नोज द स्पिरिचुअल वर्ल्ड।'' हम इन दोनों को अलग नहीं कर सकते।
एक है हमारा आध्यात्मिक जगत और दूसरा है पदार्थ जगत। यह सत्य है कि पदार्थ ही समस्या पैदा कर रहा है। लेकिन जो प्रोब्लम है, हम उसे सोल्युशन मान रहे हैं यानी समस्या को समाधान मान रहे हैं। यह हमारी एक बड़ी समस्या है। चेतना को जाने और समझे बिना समस्या का समाधान हो सके, मुझे ऐसा लगता नहीं। आज का हमारा चिंतन पूर्णतया एकांगी है। वह सारा का सारा पदार्थ के साथ जुड़ा हुआ है। आज गरीबी की समस्या को सुलझाने का प्रयत्न हो रहा हे। मैं सुनता और पढ़ता हूं कि सरकारी गरीबी की समस्या को सुलझाने के लिए बहुत प्रयत्नशील है। आज से नहीं कितने वर्षो से सुन रहा हूं। आजादी के बाद से ही सुन रहा हूं। केद्र या प्रांतों में जो भी सरकार आती है उसकी ओर से जोर-शोर से यही घोषणा होती है कि हम अपनी पूरी शक्ति गरीबी की समस्या को मिटाने में लगाएंगे। गरीबी कितनी मिटी, कितनी बाकी है। इस बारे में हम कुछ नहीं कह सकते। सरकारी आंकड़े हम भी पत्र-पत्रिकाओं में देख लेते हैं, आज भी देखते होंगे। जैसा सरकार क हती है, वह बात मैं कह रहा हूं कि गरीबी की समस्या का सुलझाने का प्रयत्न हो रहा है। भूख की समस्या को सुलझाने का प्रयत्न हो रहा है। ऐसा सरकारी और सामाजिक दोनों स्तरों पर हो रहा है।
मैंने ऐसा अनुभव किया है कि सरकार द्वारा गरीबी और भूख की समस्या को हल करने की कोशिश सफल नहीं हो रही है। यह प्रयत्न क्यों सफल नहीं हो रहा हैद्व इसका मेरी दृष्टि में एक बड़ा कारण यह है कि हमने इसके साथ चेतना को नहीं जोड़ा है। इस आधार पर हमने एक सूत्र बनाया-विद आउट अवेकिंग कंशसनेस आफ मोरेलिटी इट इज नाट पासिबल टू साल्व द प्राब्लम आफ पावरटी एंड प्राब्लम आफ हंगर। नैतिक विकास के बिना न गरीबी की समस्या को सुलझाया जा सकता है, न भूख की समस्या को सुलझाया जा सकता है। अभी भारत सरकार ने सौ दिन के रोजगार की घोषणा की। ग्रामीण विकास मंत्री भी हमारे पास आये। मैंने कहा-यह रोजगार गारंटी योजना तो आपने बना दी, किंतु नैतिकता के अभाव में यह योजना कामयाब होगी, इसमें मुझे संदेह है। मुझे स्मरण है कि आचार्य तुलसी अणुव्रत भवन में प्रवास कर रहे थे। एक दिन अचानक राजीव गांधी आए। अचानक ही उनका कार्यक्रम बना। एक घंटे पहले सूचना आई कि प्रधानमंत्री आचार्य श्री के दर्शन करना चाहते हैं। वे आए, बातचीत का क्रम चला। आचार्य श्री ने कहा-राजीव जी! आप भारत के अभी तक के सबसे युवा प्रधानमंत्रियों में हैं। देश में सबसे बड़ी समस्य गरीबी की है। आपने इस विषय में क्या सोचा है?
राजीव गांधी ने कहा-आचार्य जी! सोचा तो बहुत कुछ है। जो सोचा है, उसे इमानदारी से लागू भी करना चाहते हैं, कर रहे हैं। लेकिन हमारी समस्या यह हे कि जो हम गरीबों को देना चाहते हैं, वह उन तक बहुत कम पहुंच पाता है। हम केंद्र से एक रूपया उनके लिए भेजते हैं, तो उन तक पंद्रह पैसे ही पहुंचता है, पचासी पैसे बीच में ही गायब हो जाते हैं। इसका समाधान कैसे हो?
यह बात राजीव गांधी ने सन्1987 में कही थी। अगर आज कहते तो यही कहते कि रूपये में दस पैसे ही पहुंच पाता है। हमारे अणुव्रत शिक्षक संसद के कार्यकर्ता अहिंसा प्रशिक्षण के सिलसिले में बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे प्रांतों में शिविर लगाते हैं। वहां दूर-दराज के गावों से लोगों से भी उनका संपर्क होता हे। वहां भूख और गरीबी की समस्या बड़ी विकट है। लोगों से जब पूछा जाता है कि सरकारी स्तर पर कोई सहायता मिलती है या नहीं? तो यही उत्तर मिलता है कि पटवारीजी जाने, हाकिम साहब जाने, हम लोगों को तो कुछ भी नहीं मिलता।
केंद्र और राज्य स्तर पर जो भी सहायता ग्रामीण क्षेत्रों को दी जाती है, उसकी जिला, तहसील और ग्राम सभा के अधिकारियों में बंदरबांट हो जाती है। मंत्री जी चुनाव के दौरे पर गए या कोई उद्धाटन-शिलान्यास करने गये तो कुछ अनुदान राशि या थोड़ा बहुत अनाज चाहे वितरित हो जाए, किंतु वैधानिक रूप से सरकार द्वारा जारी कोई भी वस्तु या राशि गांव के गरीब को नहीं मिल पाती। गांव का गरीब किसान इतना समर्थ नहीं हे कि वह मील मजदूरों और कर्मचारियों की तरह हड़ताल, धरना या प्रदर्शन करके अपना हक हासिल करे। उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज है।
यह गरीबी बहुत बड़ी विडंबना है। आपने सुना होगा कि चुनाव के अवसर पर लखनऊ में बांटी जा रही धोतियों और साड़ियों के लिए मची भगदड़ में पंद्रह-बीस गरीब महिलाएं कुचलकर और दबकर मर गयी। पचास-साथ रूपये की साड़ी के लिए जहां हजारों की भीड़ इकट्टी हो, लोग जान पर खेलने को उतारू हो जाएं, उस स्थिति को आप क्या कहेंगे? गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण है भ्रष्टाचार। जब तक नैतिकता के मुद्दे पर विचार नहीं किया जाता। भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात सपना ही सिद्ध होगी। करूणा की चेतना और संवेदनशीलता की चेतना को जागृत किये बिना अनैतिकता की समस्या को कैसे सुलझाया जा सकता है? यह बहुत बड़ा प्रश्न है हमारे सामने। पदार्थ जगत की बात करते हैं तो यह बात स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है कि आज सबसे ज्यादा आकर्षण अर्थ के प्रति है। अर्थ के प्रति आकर्षण इसलिए है कि जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन तो वह है ही, इससे भी बड़ा साधन है, बड़प्पन, शान-शौकत और अहं की संपूर्ति का। पैसे में एक अजीब सा नशा है। जेब भारी हो तो भीतर से आदमी को बहुत बड़ी ताकत का अहसास होता है। पैसा कोई विटामिन या पौष्टिक की चीज नहीं है। जिसे खाकर शरीर में ताकत आ जाए। धातु का सिक्का या कागत की मुद्रा खाकर कोई अपना पेट नहीं भर सकता। लेकिन जेब में करेंसी नोटी की गड्डी है तो ऐसा आदमी, जिसने दस-बीस हजार कभी देखे न हो, उसके लिए संतुलन कायम रखना बहुत कठिन हो जाएगा।
अर्थ विलासिता और प्रदर्शन का हेतु है तथा जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का भी साधन है। किंतु आज वह साधन साध्य बन गया है। साधन जब साध्य बन जाता है तो समस्या चरम पर पहुंच जाती है, उसे आसानी से सुलझाया नहीं जा सकता। दौलत का नशा सिर चढकर बोलने लगे तो आदमी को सही रास्ते पर लाना बहुत कठिन हो जाता है। नशा कोई भी हो, उसकी हर खुराक आदमी को अगली खुराक बढ़ाने के लिए बाध्य करता है। सिगरेट और चरस के आदी लोग पहले सिगरेट और चरस की एक या दो कश ही लगाते थे, बाद में एक कश से शुरु हुआ उनका हर दो-तीन घंटे पर इसकी खुराक लेने के लिए बाध्य करने लगता है। इसी तरह अर्थ का नशा जिन पर चढ़ गया, वह सहज नहीं उतरने वाला। फिर वे स्वयं को किसी और दुनिया का निवासी समझने लगता है। उनके पांव धरती पर होकर भी उससे चार अंगुल उपर रहता है।
कहने में मुझे संकोच होता है, लेकिन कहना चाहूंगा कि जहां करोड़ों लोगों को खाने को रोटी भी न मिल पा रही हो, वहां कोई सत्तर-अस्सी करोड़ का बंगला बनाता है, तो वह क्रूर और कठोरवृत्ति का आदमी ही कहा जाएगा। सामुदायिक चेतना के बिना सोसायटी जैसे शब्द का प्रयोग करने में भी संकोच होता है। समाज तो वह होता है जिसमें सामुदायिक चेतना हो। उसका तो आज अभाव लग रहा है। फिर कैसे स्वीकार करें कि समाज उदात्त है। कई वर्ष पहले लाडनूं में आचार्य तुलसी के सान्निध्य में एक अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस हुई थी। उसमें संयुक्त राष्ट्रसंघ के अपर सचिव भी भाग ले रहे थे। उनके साथ हमारा एक संवाद चला। उन्होंने कहा कि आज अणुव्रत के द्वारा व्यक्ति का निर्माण करते हैं, किंतु इससे समाज का निर्माण नहीं होता। मैंने उनसे कहा-क्या आप ऐसा सोचते हैं कि व्यक्ति का निर्माण हुये बिना समाज का निर्माण हो जाएगा? मैंने उदाहरण की भाषा में उनसे कहा-कार तो बहुत अच्छी है, किंतु उसमें ड्राइवर नहीं है तो उसक ा संचालन कैसे होगा? हम एकांगी बात नहीं करते। हमारा ध्यान व्यक्ति और समाज दोनों पर है। व्यक्ति से ही तो समाज बनता है।
व्यक्ति को गौण कर समाज सुधार की बात हमारी समझ से बाहर है। हम समाज की भी उपेक्षा नहीं करते। व्यक्ति और समाज दोनों को महत्व देते हैं। ड्राइवर तो बहुत कुशल है, किंतु कार बिल्कुल खटारा है, तो ड्राइवर क्या करेगा? कार को ठेलकर वह मंजिल तक नहीं पहुंचा सकता। बहुत जरूरी है कि ड्राइवर भी अच्छा हो और कार भी अच्छी हो। इसी तरह चेतना का भी योग और पदार्थ का भी योग हो। दोनों का समन्वय हो तो समस्य बड़ी आसानी से सुलझ सकती है।
आज सापेक्ष दृष्टि का बहुत अभाव हो गया है। आदमी का दृष्टिकोण एकान्तिक हो गया है, होता जा रहा है। जब तक सापेक्ष दृष्टि का विकास नहीं होता, समस्या का समाधान नहीं होगा। एक व्यावसायिक या प्रोफेशनल व्यक्ति है। उसके रोल पर आप विचार करें कि उसका स्वयं का दृष्टिकोण कैसा है? आप पाएंगे कि उसका दृष्टिकोण पूरी तरह से अर्थपरक है। उसके सामने हर समय लाख-करोड ही दिखाई देते हैं। आधुनिक अर्थशास्त्र की जो सबसे बड़ी असफलता है वह यह है कि ब्रांड, प्रोडक्षन और सप्लाई-इस पर तो बहुत सारे तरीके माइक्रो या मेक्रो आदि से सूक्ष्म विश्लेषण किया गया। किंतु इसमें आदमी की पूरी तरह से उपेक्षा की गयी। आदमी को इग्नोर या नजरअंदाज किया गया। समस्याओं का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि हिंदुस्तान में तीस-चालीस करोड लोग जो वैभव का जीवन जी रहे हैं, वे स्वयं के लिए पचास करोड और एक अरब तक खर्च कर देंगे। लेकिन आम आदमी का ख्याल उनके मन में कभी नहीं आएगा। जो भी मूलभूत कारण है, चाहे वह गरीबी की समस्या हो, भ्रष्टाचार की समस्या हो, हिंसा और आतंक की समस्या हो, ये सब समस्याएं और उसके कारण चेतना जगत के साथ जुड़े हुए है। पारदर्शिता का संबंध पदार्थ से नहीें चेतना के साथ है। उत्तरदायी चेतना बनती है, न कि पदार्थ। सारी समस्याएं चेतना के जगत में पैदा होती है और उनका समाधान भी चेतना के जगत में ही हो सकता है। इसलिए हम चेतना जगत की उपेक्षा कर केवल अर्थशास्त्रीय नियमों और पदार्थ के नियमों के आधार पर समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
प्रस्तुति- मुनि जयंत कुमार


हमारे साथ विज्ञापन करें | अपने सुझाव | सबस्क्राईब करे | सूचना | हिन्दी साहित्य की प्रमुख वेबसाईट्स
ताप्तीलोक पब्लिकेशन्स, गंगोत्री, न्यू सिविल रोड, सूरत - 1
2005-07 copyright www.taptilok.com | Taptilok | Hindi Literary Magazine
Designed by Sri Technocrat | Best viewed in 800 X 600