डॉ. सतिन देसाई 'परवो' को लोकतेज साहित्य-सेवी पुरस्कार
|
घनश्यामप्रसाद सनाढय
|
गुजरात के गुजराती भाषा और उर्दू ाुबान के आीम शायर डॉ. सतिन देसाई परवो को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिये वर्ष 2007 के लोकतेज साहित्य-सेवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। ताप्तीलोक की ओर से दिनांक 9 अगस्त, 2008 को दाहोद में आयोजित एक विशिष्ट सारस्वत सम्मान समारोह में प्रशस्ती-पत्र एवं 5000 रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान कर उन्हें लोकतेज साहित्य-सेवी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि डॉ. किशोर काबरा, सुप्रसिद्ध गीतकार श्री बालकवि बैरागी, वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. भागवतप्रसाद मिश्र नियाा, वरिष्ठ हिन्दी सेवी श्री मनोहरजी कोठारी, श्री बाल शास्त्री प्रेमी एवं आचार्य श्री रघुनाथ भट्ट तथा संत साहित्य के अध्येता डॉ. ईश्वरचन्द्र देसाई लोकतेज पुरस्कारों से सम्मानित किये जा चुके हैं। डॉ. सतिन देसाई 'परवो' गुजरात की एक ऐसी विरल साहित्य प्रतिभा हैं जिन्होंने न केवल गुजराती भाषा में ही अपितु हिन्दुस्तानी भाषा और उर्दू ाबान में भी ऐसे साहित्य रचना की है जिसके बलबूते पर साहित्य जगत में उनका एक अनूठा स्थान है। बतौर शायर वे देश भर में सुख्यात हैं और राष्ट्रीय मुशायरों में पढ़ी गई उनकी ंगालें अपनी मिसाल आप हैं। वैसे तो आजकल धड़ल्ले से कविताएं लिखी जा रही हैं और ंगाल लेखन का चलन एक फैशन की तरह आम हो गया है, तथा ंकलमकार हर विषय पर कविताएं और ंगालें लिख रहे हैं, परन्तु कविताओं और ंगालों की भरमार के बीच सच्ची कविता और मुकम्मिल ंगाल कभी कभार ही दिखलाई पड़ती है। डॉ. सतिन देसाई परवो एक सच्चे, समर्पित और निष्ठावान साहित्यकार हैं और उनकी ंकलम से अनेकानेक मुकम्मिल ंगालें लिखी जा चुकी हैं जो साहित्य जगत की अनमोल धरोहर सिद्ध हुई हैं। डॉ. सतिन देसाई 'परवो' ने गुजराती भाषा में विपुल मात्रा में ंगालें लिखी हैं और दर्जनों गुजराती ंगालकारों की सैंकड़ों ंगालों का उर्दू में अनुवाद किया है और इससे भी बढ़कर खालिस उर्दू ाबान में प्रचुर मात्रा में मुकम्मिल ंगालें लिखी हैं जो आज राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर लिखी जा रही उर्दू ंगालों के मुकाबले में उन्नीस नहीं मगर इक्कीस ही ठहरती हैं। डॉ. सतिन देसाई 'परवो' के गुजराती ंगाल संग्रह, प्रतिनिधि गुजराती ंगालों के उर्दू अनुवाद संग्रह, तथा उर्दू ंगाल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनका गुजरात साहित्य अकादमी द्वारा 1993 में प्रकाशित गुजराती ंगंजल संग्रह 'मुखोमुख' विशेष रूप से सराहा गया है। उनकी उर्दू ंगालों का संग्रह 2001 में प्रकाशित हुआ। उनका गुजराती ंगंजल संग्रह 'पलने साड़ बीडो', उर्दू ंगाल संग्रह 'तो मैं मैं न था वहाँ', तथा उनके विवेचन संग्रह, हिन्दी कहानी संग्रह व उर्दू अनुवाद संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रहे हैं। डॉ. देसाई ने ंगाल अनुवाद के क्षेत्र में विरल कार्य किया है। उर्दू अनुवाद विशेषांक 2002 में उनके अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। उनका भूपेन्द्र सेठ 'नीलम' की ंगंजलों का उर्दू अनुवाद 'नायाब नगीने' 2005 में तथा हर्ष ब्रह्मभट्ट की गुजराती ंगंजलों का उर्दू अनुवाद 'लफ्ंजों का बे-पैकर सफर' 2007 में प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त 'तादर्थ्य' मासिक ने उनके अनुवादों के दो स्वतंत्र उर्दू अनुवाद विशेषांक 2007 में प्रकाशित किये हैं। उनकी रचनाएं नवनीत समर्पण, कुमार, कविलोक, शब्दसृष्टि, परब, तादर्थ्य, बुद्धि प्रकाश, विश्राम, कविता, कवि, धबक, शब्द गगन, अखंड आनन्द जैसे गुजराती सामयिकों एवं रचनाकर्म, तुलसीप्रभा, सरिता, ताप्तीलोक जैसी हिन्दी पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा उनकी कृतियां अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं एवं विशिष्ट संपादनों में शामिल की गयी है। इनके द्वारा रचित भाव मंत्रों (प्रार्थना) का नित्य गान दाहोद और बारिया के अनेकानेक विद्यालयों में हो रहा है। श्री देसाई को उनकी कृतियों के लिये कई सम्मानों से नवांजा भी गया है। 'मुखोमुख' ंगंजल संग्रह को गुजरात साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया तो उनको 'कवि' एवं 'तादर्थ्य' पत्रिका के श्रेष्ठ ंगंजलकार के रूप में भी सम्मानित किया गया। 2003 में उनको शेठ श्री गिरधरलाल संस्कार केन्द्र का निष्ठा पुरस्कार प्रदान किया गया। ंगंजलकार महेमद हुसैन के हाथों इनको 2005 में माँ हरिश्वरी देवी संस्थान केन्द्र बड़ौदा की ओर से वरिष्ठ ंगंजलकार पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इंडियन मेडिकल एसोसियेशन के वार्षिक कार्यक्रम साहित्य ना चौरे में भी श्री देसाई का अभिवादन किया गया है। उर्दू साहित्य में उनके योगदान के फलस्वरूप उनको दूरदर्शन के उर्दू कार्यक्रम 'गुफ्तगूं' में बेस्ट केसेट ऑफ दी इयर का एवॉर्ड दिया गया। श्री देसाई को संत श्री मुरारीबापू के 'अस्मिता पर्व' समारोह में 'आधुनिक श्रवण' पुरस्कार प्रदान किया गया। अभी अभी श्री दीक्षित दनकौरी के संपादकत्व में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वारा प्रकाशित ंगाल दुष्यंत के बाद नामक गाल संग्रह में डॉ. देसाई की ंगालें संग्रहित की गई हैं। उनकी ंगालों को हरिहरन, जसवंतसिंग, अशोक खोसला, पुरुषोत्तम उपायाय, आशित देसाई जैसे अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों ने गाया है और उनकी कैसेटें देश में और विदेश में पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से उनके कार्यक्रम नियमित रूप से प्रसारित होते रहते हैं। डॉ. सतिन देसाई ने हिन्दुस्तानी भाषा में कहानियां भी लिखी हैं जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी कहानियों में विशेषत: संवेदनात्मक आवेगों की अभिव्यक्ति होती हैं। कहानी का शिल्प उसके कथ्य के अनुरूप स्वत: ही ढलता जाता है। कहानी का नायक बहुधा सतिन अथवा अन्य नामधारी सतिन सा व्यक्तित्व ही होता है। कहानियों का मूल बीज लिरिकल होने के कारण ये कहानियां अंतरमन को न केवल छू लेती हैं, अपितु हमारे मनोजगत को झकझोर भी देती हैं। गुजरात के श्रेष्ठ समालोचकों ने डॉ. सतिन देसाई के साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन किया है जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ है। इनमें डॉ. शरद ठाकर, ानाब रशीद मीर, ानाब नसीर इसमाईली, डॉ. केशुभाई देसाई, डॉ. चीनु देसाई, डॉ. राधेश्याम शर्मा, डॉ. गुणवंत शाह, प्रा. सरोज पाठक, श्री निर्मिष ठाकर एवं डॉ. चीनु मोदी प्रमुख हैं। डॉ. सतिन देसाई 'परवो' का शायराना अंदाा सूंफियाना है। वे उनकी शायरी में जीवन और जगत की बातें करते अवश्य प्रतीत होते हैं, परन्तु जीवन और जगत से उनकी निस्बत बुनियादी है। हयात से उनका सरोकार इस कद्र ंगायबाना है कि उनकी शायरी में वे ंखुद की और ंखुदा की बात करते नार आते हैं और वह भी इस अंदाा में कि ंखुदी और ंखुदाई एक रूप होकर समस्त जीवन और जगत को उसकी अखिलाई में समेट लेते हैं। एक ओर जहां डॉ. सतिन देसाई का शायराना अंदाा सूंफियाना है तो दूसरी ओर उनका व्यक्तित्व औलिया के जैसा, एक अलगारी के जैसा है। पेशे से वे एक मेडिकल डॉक्टर हैं, गोल्ड मेडालिस्ट हैं। अमेरिका में मेडिकल प्रेक्टिस करने के लिये आवश्यक ई.सी.एफ.एम.जी. की परीक्षा उन्होंने विशेष योग्यता के साथ पास की थी। परन्तु मेडिकल प्रक्टिस वे दाहोद में ही कर रहे हैं और गरीब आदिवासी मरीाों की चिकित्सा वे उनका धर्म समझकर कर रहे हैं। घर में माँ की सुश्रुषा वे अकेले ही करते हैं। पुत्र तो वे हैं ही, परन्तु पुत्रवधू का दायित्व भी स्वयं निभाते हैं। माँ को पुत्रवधू का अभाव कभी खलने नहीं देते। माँ को कभी अकेला नहीं छोड़ते। जहां भी जाते हैं, वृद्ध माँ को साथ लेकर जाते हैं। ताप्तीलोक का डॉ. सतिन देसाई 'परवो' विशेषांक सोद्देश प्रकाशित किया जा रहा है। लोकतेज साहित्य-सेवी पुरस्कार से सम्मानित इस लेखक का विस्तृत परिचय ताप्तीलोक के पाठकों को सहज उपलब्ध हो सके, इस उद्देश से इसमें उनकी 88 ंगालों और 5 कहानियों को एक साथ प्रकाशित किया गया है। साथ ही डॉ. देसाई पर लिखे गये चंद आलेख भी सम्मिलित किये गये हैं जिनके माध्यम से उनकी ंगालों का और उनकी कहानियों का सम्यक मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है। वैसे तो डॉ. सतिन देसाई एक जाने-माने साहित्यकार हैं और ताप्तीलोक के पाठक उनकी रचनाओं से भलीभाँति परिचित हैं, परन्तु इस विशेषांक के माध्यम से हमने उनकी समग्र साहित्य प्रतिभा की झाँकी करवाने का यहां उपक्रम किया है। डॉ. सतिन देसाई से संपर्क के लिये उनका पता है : डॉ. सतिन देसाई 'परवो' 21 अमृतवाड़ी सोसायटी, दाहोद -390151 दूरभाष : 02673-211339222155
|
|
|
|
|
|