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कहानी

हथौड़ा

भोलानाथ मंदिर की पिछली दीवार से लगा हुआ पचास साल पुराना घर हर सुबहो-शाम मंदिर के घंटे और आरती के निनादों से भरा रहता था। मंदिर के जीर्णोद्धार के सामने शायद इस घर ने दम तोड़ने की ही ंकसम खाई थी। घर तो कई आपत्तियों के बीच भी टिका हुआ था लेकिन उसकी जर्जरित दीवारें स्वर्गवासी की तस्वीर की प्यासी हो तड़प रही थी।
नटवरलाल के तीन तंग कमरों में तीन पीढ़ियों ने अपने-अपने मंत्र फूंके थे। उस दिन मंत्रोच्चार के साथ मंदिर से लगी दीवार पर एक तस्वीर को सजीवन करने, कुछ स्वजनों की भीड़ जमा हुई थी। रतिलाल जो कि नटवरलाल के स्वर्गवासी पिता थे, उनका तेरहवां मनाया जा रहा था। जब पश्चिमी उंफक की दीवारों की खूंटी से सूरज के शव को उठाकर समंदर में फेंका गया, उसी वंक्त रतिलाल के चित्र को छत को छूते कोने पर दुबारा टींगाने का अवसर जाग उठा था। दीवार की दुर्दशा मुंह लटकाकर स्वजनों को मना ंफर्मा रही थी। उसको पूरा यंकीन था कि खूंटी सीने में उतरते ही शायद उसका सीना रतिलाल की तरह ही दम तोड़ देगा। उसे ये अंफसोस था कि पढ़े-लिखे घर के ये लोग इतना तक जानते न थे कि इंसान की तरह दीवारों में भी एक धड़कता दिल होता है। अगर उसी में छेद हो जाये तो वह सीना भी लहु-लुहान हो धड़कने से इंकार कर देता है। मगर दीवार के इस संजीदा ंफलसंफे की ओर कौन ंगौर ंफर्माता? यहां तो-खूंटी और हथौडा...दोनों ही उसे भेदने को हर पल बेताब थे। सो एक लम्बी खूंटी की नोक ने भाले के समान उसका सीना चीर दिया। भाला तो शायद चीर के बाहर भी आ जाता है, मगर यहां तो खूंटी ने अपना प्रत्यारोपण करके हथौडे क़ो विजयी ंकरार किया था। इस एक-तरंफा जंग में विजय उद्धोष के नारों में केवल हथौडे क़ी टक-टक का ही नाद मंद-मंद सुनाई दिया था। क्योंकि न तो दीवार प्रतिकार के ंकाबिल थी, ना ही उसने प्रतिकार किया था। रतिलाल की तस्वीर मृतक की नहीं लेकिन पूरे ंकद की जीवंत प्रतिमा का रूप धरे दीवार पर अपने होने का एहसास जगा रही थी। स्वजनों ने एकटक निहारा। उनकी दृष्टि ने उस वक्त उनके कान खुले रखे होते तो शायद दीवार की बुझी हुई चीखों के साथ रतिलाल के अंत:करण के करूणा के स्वर को सुन पाती। पर, वह सुनती भी क्यों? जहां तस्वीर की दीप प्रागटय के साथ स्थापना हुई, वहां मंदिर के घंटारव ने दुबारा सूरज के मृतदेह का आह्वान किया। दोनों तरंफ आकाश और मंदिर की दीवारों में एक ही नाद गूंज रहा था जो स्वर्गवासी आत्माओं को चिर स्मरण में लाने का। जो हथौड़ा उस दिन ंखस्ता दीवार पर ाोर जमा चुका था, शायद उसी की किसी हमाात ने रतिलाल के जीवन काल में उन पर कई बार वार किये थे। एक शाम बचपन में जब मां दर्शन को सिधारी थी, रतिलाल अपने स्वर्गवासी पिता की तस्वीर को निकट से निहारने की चेष्टा में ऊंची दीवार पर चढ ग़ये थे। तस्वीर उतरकर बाहों से आंखों में समा तो गई थी, मगर उतरते वक्त उसने कील से अपना नाता तोड़ दिया था। नाता टूटने के ंफौरन बाद कील और दीवार की दरार में लम्बा-चौड़ा अंतर पड़ गया था। रतिलाल ने घबराहट में जब हथौडे से दीवार में दुबारा कील लगाने को वार किया, तो स्वयं हथौडी ने अपना मंकसद बदलकर कील के माथे की बजाये उसी के सर पर वार कर दिया था। वह ंखून आज तक दीवार ने अपने सीने में छिपाये रखा था, वहीं ंखून उसके माथे से धारा बन बहने लगा था। दीवार हो या किसी का सर, हथौड़े का केवल ाोर और ाख्म से ही वास्ता रहता है। सो उसने कर दिखाया था। तस्वीर तो दुबारा दीवार को छू न पाई थी। पर रतिलाल की मन की खूंटी पर तस्वीर समेत हथौड़ा बराबर लटक गये थे। मुंकद्दर अपने पहले चरण चलते ही अपने आने वाले चरणों की तासीर प्रगट कर ही देता है। अपने मुंकद्दर का अंदाजा रतिलाल को ंखूब हो ही चुका था। दीवार से गिराकर जिस तस्वीर का उन्होंने ंखून किया था उसी ने अपनी साा स्वरूप उनकी मां को जवानी में ही छीन लिया था। ंगरीबी के घेरे में फंसे रतिलाल के पास एक पुराना मकान और छोटी-मोटी णमीन के अलावा कुछ बचा न था। घर-दीवार तस्वीर का मनहूस सिलसिला उनके दिमांग में घर कर गया था। एक शाम वह हथौड़े को घर से निकालने को कृतनिश्चयी हो बााार की ओर चल पड़े। बीच राह गली में एक टूटते मकान ने उसे रोककर हंगामा खड़ा कर दिया। वह मकान जो वैसे ही धराशायी होने वाला था, उसे उसके ंखरीददार ने वक्त से पहले ही माार में परिवर्तित कर दिया था। शाम के धूंधलके में सूरज की दीवारों की तरह मकान की दीवारें भी टूट कर गिर चुकी थी। मगर उसका एक कोना अपने अस्तित्व को टिकाने में बराबर लगा हुआ था। मानो कि वह अपने प्राण किसी भी ंकीमत पर त्यागने को तैयार नहीं था। मादूर-मेमार सभी अपने-अपने घर सिधार चुके थे। परिन्दे भी आशियानों में लौट तिनके की दीवारों को सहला रहे थे। मगर उस मकान का नया मालिक ामीन पे खड़े हुए आकाश को ताक रहा था। दो हाथ जोड़ यही प्रार्थना कर रहा था कि कोई ंफरिश्ता उतरकर मेरी रही-सही दीवार को गिराकर मुझे मोक्ष दिलाये। अचानक रतिलाल हथौड़ा समेत गदाधारी भीम की तरह युध्दविराम की क्षणों में भी प्रगट हुआ। मांसल बाहु में वानदार-तांकतवर हथौड़ा ने मालिक को संमोहित कर दिया। ंफौरन उसने रतिलाल की जमीं चूमी। जेब में दस रूपये का ताजा नोट सरका दिया। ंगरीबी के फटे-पुराने जेब में ये शाही नोट ने जाने कोई तख्त ही रचा दिया था। उसे लगा कि हथौड़े ने पहली बार उसकी इज्ज़त बढ़ायी है। हथौड़े के सर से लगी मिट्टी को नार-अंदाा कर वह बार-बार चूमने लगा था। हथौड़े ने अपना ंकरिश्मा कर दिखाया। शाम के फैलते अंधेरों में रतिलाल के सीधे हाथ के वार ने दीवार को गिराकर पहली बार विजय का डंका बजाया था। वह बड़े गर्व से अपनी पेशानी पर लगे पसीने को पोंछ उसके रंग को परखने की कोशिश करने लगा। कहीं मेरे लहू का रंग लाल रंग बदलकर पानी होकर मुझे छल तो नहीं रहा है। या ंफिर ये हथौड़ा ही मेरे लहू के रंग को बनाये रखने में आजीवन मेरा साथ देने वाला है। हथौड़े की करामतों का ये सिलसिला सारे गांव में चल निकला। जिस हथौड़े ने बाप की तस्वीर मिटाने में अहम भूमिका निभाई थी, वही हथौड़ा उसके जीवन निर्वाह का सामान हो गया था। छोटी-बड़ी इमारतों की तामीर में इस हथौड़े ने जो कमाल कर दिखाया था, शायद ही कोई गांव में कर दिखाता। कई इमारतें आकाश को छूने लगी थीं।
रतिलाल अब न सिर्फ मेमार थे। वे आगे बढ़ अहम कोन्ट्राक्टर हो चुके थे। उनकी चिलम की फूंकों से सुब्हो-शाम आकाश में गुब्बारे छाये रहते थे। मानो कि वे हर शाम सूरज को खूंटी से उतारते-नाारे को ंगुब्बारों में ही बदलने की कोशिश कर रहे हो। वे अब यही चाहते थे कि जो एक बार ऊंचाइयों पर टांग जाता है उसे नीचे उतरने का, या उतारने का अधिकार केवल सांसों के ंगुब्बारों को ही होता है। कई पुराने घरों को धराशायी करने में उसी हथौड़े ने अपना रंग जमाया था। मगर घर टूटते वक्त ज़ज्बाती होकर हथौड़े की नम-निगाहों ने कई बार तन्हा कोने में ंखून के आंसू बहाये थे। हथौड़े के अतिनाद को सुना-अनसुना कर स्वयं रतिलाल घरों पर टूट पड़ते थे। उन्हें तो केवल तथाकथित पुर्ननिर्माण की चेतना ने घेर लिया था। वे यह भूल गये थे कि उस घर में बीते हुए युगों के श्वास-प्राण पर वे बेवजा अनगिनत वार कर रहे थे। एक दूसरे मकान की लालच के घेरे में वे स्वयम् अपना स्वरूप खो चुके थे। वे पुराना घर बंद कर नये घर के निर्माण में हथौड़ा समेत लग गये थे। सारा सामान इंट-पत्थरों के ढ़ेर समेत बााार में बिक रहा था। मगर एक वह हथौड़ा बचा था जो उनकी विरासत संभाले हुए अपनी ताकत का प्रदर्शन सालों से कर रहा था। बरसों गाुर गयें। गांव का रूप-स्वरूप बदल गया। ऊंची-ऊंची इमारतें अब आकाश को सजदे के लिये मजबूर कर रही थी। कई मादूर मेमार-ामीनदार अपने-अपने औजारों और मिल्ंकत के साथ-अदल-बदल हो चुके थे। रतिलाल का नया मकान भी अब वही पुराने मकान की तस्वीर बन चुका था जिसकी इक दीवार ने उसके स्वर्गवासी पिता की तस्वीर को पुन: स्थापना से इंकार ंफर्माया था। वह तन्हाई के घेरे में एक रात अपनी मां की तस्वीर को एकटक निहारने लगा था। जब अतीत के सायों ने चिलम के धुएं को चीर उनके मन पर घेरा किया तब उन्हें लगा कि छत-दीवारें चाहे आकाश को छूती ही क्यूं न हो, मां-बाप की तस्वीरें तो वहां से भी ामीं की तरंफ ही देखती हैं। आंखिर ये दीवारें भी छत-समेत ामी को चूमने अपने आप नीचे उतर आती है। ये सोचते ही सोचते उनकी आंखें दीवार पर लगे दर्पण में समा गई। चेहरे की मुरझाई हुई लकीरों से उन्हें अपनी ढ़लती उम्र के ंखस्ता मकान की दीवारें नजर आई। वे चौंक उठे थे। कहीं ये जिस्म का मकान भी किसी गैबी हथौड़े के वार से एक दिन....। रतिलाल ने जिस निर्जीव हथौड़े के वारों से अपने श्वास प्राण बनाये रखे थे, उसी पर एक दिन किसी गैबी हथौड़े ने प्रहार कर ही दिया। जिस्म का मकान ढह गया था। उनके वारिसों ने दूसरा मकान बेच कर बाप के रिश्तों से आंख फेर ली थी।
मंदिर से लगे उसी पुराने मकान में पुन: प्रवेश कर वे दुबारा तस्वीरों का सिलसिला रचाने में मश्गूल हो गये थे। सो रतिलाल की तस्वीर लटक गई थी। मकान के खरीददार डॉ. संजय वहां मेटरनिटी होल बनाने को बेताब हो रहे थे। मकान के पुन: अवतरण के लिए उसने सिोरीयन की कैंची चलाने के बजाय हथौड़ों के वार पर जोर दिया था। गांव के सबसे बड़े कोन्ट्राक्टर रतनलाल अपने पूरे ंकाफले समेत मैदाने-जंग में उतर पड़े थे। छत-दीवार समेत हर जगह हथौड़े-ही-हथौड़े युध्द के वार में लग गये थे। जब एक हथौड़ा हाथ से छूट किसी कमरे में आ गिरा, तब कमरे के कोने में पड़ा रतिलाल की विरासत को संभालने वाला वही हथौड़ा, हाथ फैलाकर रतनलाल से प्रार्थना में जुट गया। भाई! इस घर की विरासत का मैं आंखरी वारिस हूं। जब आप सारी विरासत ही मिटा रहे हों तो मुझे क्यों बख्श रहे हो। मंदिर के घंटारव ने शाम के ढलने का उद्धोष कर दिया था। ंफिर सूरज के शब को क्षितिज की वही पुरानी खूंटी से उतारकर समंदर में फेंका गया था। यहां रतिलाल की ंखाक को तरसते हथौड़े ने रतनलाल के मन-मंदिर में घंटारव करा दिया था। रतनलाल की आरती के स्वर में घंटारव के बजाय अगणित हथौड़ा रव गूंजने लगे थे।
रतिलाल के धराशायी मकान पर रतनलाल के आंसूओं का अभिषेक हुआ...और रतिलाल की तस्वीर सरापा भीग गई।


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