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कहानी

आशियाना

अतुल को प्लेटफार्म के हवाले कर गाड़ी चल दी। पलक छपकते ही वहां सन्नाटा छा गया। वैसे भी छोटे गांव में मुसांफरों का आनाजाना कम ही होता है। एक लम्हा उसने नई ामीन को देखा, फिर उसकी निगाहें आसमान पर जम गई। कुछ पंछी ंकतारों में लौटते नार आये। वे उसके सर से गाुरे। कुछ पल चहचहे गूंजे। फिर वही सन्नाटा। पंछी अपने-अपने आशियानों में उतर गये। वह मन ही मन मुस्काया...चलो मैं भी तो देखूं मेरा आशियाना कहां है।
अतुल सीविल इंजीनियर था। युनिवर्सिटी में अव्वल आया था। बचपन ही से उसकी आंखों में औरों के घर बनाने के सपनों का समंदर उछल रहा था। उसकी आंखों ने पिताजी का साया तक न देखा था। मां ने अस्पताल में जनम तो दिया, लेकिन उसी रात भूचाल के हादसे में पिताजी मलबे तले दफ्न हो गये। मां की गोद तो भर गई। लेकिन घर-घर न रहा। एक नये अवतार ने बेघर ामीन पर ंकदम रखा था। अस्पताल को छोड़ा तो नारी आश्रम ने सहारा दिया।
भूचाल से बे-घर लोगों का मातम उसके मन की तहों में ालाले की तरह गर्क हो गया था। वह जब कभी भी फटता उसका अज्म और माबूत होता था। वह यूं समझने लगा था कि उसका अवतार सिंर्फ बे-घरों के लिए ही हुआ है। वीरानियों को आबाद करना, नये मकान खड़े करना, नई बस्ती रचाना, यही उसके जीवन का मंकसद हो चुका था।
सरकारी इंजीनियर होने के नाते वह तबादले के चक्र में घूम रहा था। छोटे-छोटे गांवों में नई सरकारी कोलोनियों की नींवे उसे डालनी थीं। वह स्टेशन से बाहर आया। जब सूरज धरती को आंखरी सलामी दे रहा था, उसने भी एक आनबी की सलामी झेली। वह उसके साथ चल पड़ा।
स्टेशन से कुछ दूरी पर उसे एक नई कॉलोनी नार आई। दस-बारह छोटे-बड़े मकान एक दूजे के मुंह ताकते थे। दो-तीन मकानों में रोशनी थी। बांकी अपने-अपने तालों में बंद थे। चांदनी रात में उसने चारों ओर नारें घुमाई। उसे लगा कि वह घने जंगल के बीच नये जानवर की तरह दांखिल हो रहा है। चलो जंगल ही सही, अपना एक आशियाना तो है।
रात भर बिस्तर पर लेटे वह सोचता रहा। औरों के तो कई मकान वह तामीर कर चुका था। लेकिन अपनी मां को नारी-आश्रम के अलावा और क्या दे पाया था। अमीरी के समंदर में तैरती स्मिता को भी अपने मायाजाल में फंसाकर आश्रम की छत तले मां के हवाले छोड़ आया था। क्या अपने बे-घर होने का मतलब ये तो नहीं कि किसी बसे-बसाये घर को उजाड़ दे।
ंखयालों की भीड़ को बार-बार सन्नाटे चीरते गये। जब सवेरे रतजगा टूटा, उसकी आंखों में नये सूरज ने और कानों में चहचहों ने अपना घर करना शुरू किया। अपने-अपने आशियानों से पंछी आसमान को चूमने निकल पड़े।
वह नहा धोकर, तैयार होकर आंगन में आया। ताला बंद करके चलने ही वाला था कि उसकी नार एक अजीब-से पंछी पर जम गई जो आंगन के एक कोने में चुपचाप बैठा था। वह उसे निष्पलक देखता रहा। पंछी भी निष्पलक अतुल को तकने लगा। दो अजनबी एक-दूसरे से परिचित होने के लिए ंखामौश गुफ्तगू कर ही रहे थे कि चौकीदार ने आवाा दी ...
'चलो साब, चाय-नास्ता तैयार है।'
वह ऑफिस पहुंचा। घने सायेदार पेड़ों के बीच आफिस की दीवारों का डेरा था। कई पंछी उसके स्वागत में चहचहे लगाने लगे। ड्राइंग टेबल के सर पर कबूतर का आशियाना था। दिन भर उनकी घुटर-घुटर होती रही। बार-बार वे अपने आशियाने से निकल कर, चोंच-से-चोंच मिलाकर पर फड़फड़ाके गुफ्तगू करते, और वापस ...
वह स्मिता के ंखयाल में खो गया। हम भी पंछी ही तो हैं। हमें भी एक ऐसे आशियाने की ारूरत है जिसमें दो दिल एक हो जायें। लेकिन बचपन से बेघर का सिलसिला आज भी उसे घेरे हुए था।
शाम को वापस लौटा जब सारे पंछी आसमान से फिर अपने आशियाने में लौट आये थे, तब भी वह एक अजीब-सा पंछी आंगन के कोने को अपने ामीनो-आसमान बनाये बैठा था। वह उसी जगह बैठा था, जहां वह सवेरे था।
अतुल फिर उसे हैरत से तकने लगा। बड़ा अजीब है ये। न हिलता है, न खिसकता है, न चहकता है, न पर फड़फड़ाता है। अच्छा-खासा दुरस्त दिखाई देता है। फिर क्या वजह है कि यूं समाधि लगाकर बैठा है।
दूसरे दिन भी जब पंछी ने समाधि न खोली, तो अतुल उसके आबो-दाना की ंफिक्र में लग गया। उसने दाने डाले। प्लेट में पानी भर के सामने रखा। लेकिन वह पंछी आशनाई करने को रााी न था। पंछी ने आंखें घुमाई, पर फड़फड़ाये, और चोंच गरदन हिलाकर नकार में जवाब दिया।
उस रात वह सोचता रहा। क्या कारण होगा इसके यूं बरतने का। न तो वह मुझसे डरता है, न तो वह परिचित होने को राजी है। क्या कारण है कि उसने अपने परों की तांकत को समेट लिया है। अपने मधुर स्वर का गला घोंट दिया है। अपने पंछी होने का अहसास मिटा दिया है।
कुछ दिन यूं ही ऑफिस के कारोबार में गाुर गये। उसके आसपास सारे मांर बदलते रहते थे। लेकिन एक वह पंछी था कि जिसमें बदलाव की कोई उम्मीद नार न आती थी।
उसे लगा, चलो जैसा भी हो, ंखामौश ही सही, मेरा हम-संफर तो है। उसे मौन पंछी को देखके तसल्ली होती कि अब वह अकेला नहीं है। लेकिन एक गूढ़ सवाल उसे खाये जा रहा था कि ये पंछी क्यों ऐसा हो गया है।
वह बड़ा बेचैन हो उठता। उसके आसपास सभी बाशिन्दे नये थे। वह किससे उसका राा जानता। किसी पंछी से वह पूछता, तो पूछता भी कैसे। आंखिरकार उसके दिमांग में चौकीदार रोशन हुआ।
''अरे भाई। आपने मेरे आंगन का वह पंछी तो देखा है ना। मैं कई दिनों से इस उलझन में हूं कि ये पंछी जो उड़ने के ंकाबिल है वह..अपने पर क्यों नहीं फड़फड़ाता, गगन की सैर क्यों नहीं करता।''
पूछते ही चौकीदार की सांसें भर गई। आंखें नम हो गई। मानो किसी ने उसे अपने ही ंखानदान की दर्दभरी दास्तान सुनाने को मजबूर किया हो।
वह कुछ देर सिसकियां लेता रहा। जब उसने ंखुद को संभाला, तो वह बोला।
''हम क्या बतायें, बाबूजी। आप तो सरकारी अंफसर हैं। हम अगर आपके ंखिलांफ कुछ बोलेंगे, तो हमारी छूट्टी भी हो सकती हैं। लेकिन जब आप इस पंछी में खो गये हैं तो मुझे ये कहना ही पड़ेगा कि सरकार हम जंगल वालों से चाहती क्या है। नये-नये मकान बनाने का नाटक हमें खाये जा रहा है। आप हमारे यहां राम बनकर आये हैं। आपने हमारे वन में प्रवेश किया है। जहां आप खड़े हैं, उसकी चारों ओर घना जंग़ल था। लेकिन अब...''
उसकी आंखों से बीते हुए वक्त क़े आंसू बहने लगे। ''यहां हमारे भी झोंपड़े थे। हमारी मां कहा करती थी, बेटा। ये पेड़-पेड़-पेड़ नहीं ऋषि है जो समाधि लगाये खड़े हैं। और ये पंछी-पंछी नहीं, उनके मंतर हैं। जब वे पेड़ पर आशियाना बनाते हैं तो पेड़ की समाधि का बल और बढ़ जाता है। लेकिन आप शहरी बाबू क्या जानें, जब कोई पेड़ कटता है, हमारे हाथ-पांव कट जाते हैं।
जहां आप खड़े हैं, वहां नीम का पेड़ था। उसे सरकारी जल्लादों ने एक दिन दोपहर में हलांक कर दिया। उस पर इस पंछी का आशियाना था। उसमें उसकी माशूंका अपने बच्चे समेत सोई हुई थी। ये बेचारा आबो-दाना के लिए आसमान पार गया था। उसे क्या मालूम कि उसकी वापसी से पहले ही उसका परिवार आशियाना समेत शांखों तले दफ्न हो जाएगा।'' वह आगे बोल न पाया। उसके हाथ-पांव कांपने लगे थे।
अतुल भी अपने मााी में खो गया। उसकी आंखों के सामने वही चींखता हुआ मलबा पथराने लगा जिसके तले बाप का जिस्म टुकड़े-टुकड़े हो गया था।
''क्या ंफंर्क है उस मलबे में और पेड़ों की शांखों में।
क्या ंफंर्क है मेरे और पंछी के उजड़े आशियानों में।
क्या ंफंर्क है मुझ में और इस पंछी में।''
''साब, तब से ये पंछी, इस कोने में जहां उसका परिवार दफ्न हो गया था, ारा-सा भी हटता नहीं है।''
अभी राा खुला ही था कि तार वाले ने उसके कांपते हुए हाथ में तार थमा दिया जिसमें लिखा था कि स्मिता मां को अकेला छोड़ के मायके चली गई है। मां उसके सदमें में ही..
मां तो स्वर्ग को सिधार गई थी। स्मिता अतुल के साथ आशियाना बनाकर रहने को अब रााी न थी।
पंछी की तरह उसका आशियाना भी लुट गया। जब वह वापस लौटा, उसी कोने में वह पंछी उसका बराबर इंतजार कर रहा था। उसके ंकदम रखते ही पंछी ने पर ंफड़फड़ाये। उसके शाने पर बैठ गया। दोनों एक-दूसरे के हमदर्द हो चुके थे। अतुल मकान में दाखिल हुआ। पंछी के बालों पर हाथ फेरते हुए बोला...


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