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व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व

डॉ. विजय सिंह नाहटा
वैकल्पिक समाज संरचना की अवधारणा पूर्णत: विधायक है, निषेधात्मक नहीं। यह मानवीय चेतना के निरंतर गतिमान रहने के उपक्रम के परिपार्श्व में अधिक हृदयंगम बन सकती है। मानव जीवन तथा चराचर जगत का हर क्षण परिवर्तन से अनुप्राणित है। इस विचार दृष्टि से भी वैकल्पिक समाज रचना का विचार, उस पर चिन्तन, मनन एवम मंथन सामाजिक गति से अन्योन्याश्रित रहता है, परस्परापेक्षी है तथा प्रभावित होता है। यह विचार कि समाज के समकालीन मानदण्ड परिवर्तनशील हैं (शाश्वत मानदण्ड नहीं) क्योंकि समाज व्यवस्था के स्वरूप, उसकी प्राथमिकताओं तथा व्यक्ति के चेतना स्तर को विनियमित करने वाले कारक भी गतिमान हैं तथा हर युग, हर काल खंड में उन प्रतिमानों में युगानुरूप परिवर्धन होते रहने समीचीन है। सामाजिक बदलाव की, बेहतर बनाने वाले विकल्प की गांधी विचार दर्शन से अनुप्राणित संकल्पना टकराव के विचारधारात्मक संघर्ष या उन्माद पर केन्द्रित नहीं हो सकती तथा वर्तमान में जो व्यवस्था काबिज है उसके प्रति कोई दुराग्रह भी नहीं रखती। हां यह समन्वय एवम् रचनात्मकता के सार्वभौमिक चिन्तन पर आरूढ़ समाज व्यवस्था का सिंहनाद है जहाँ सहअस्तित्व एवम् सामाजिक सौमनस्य की छाया में युगीन सकारात्मक परिवर्तन वांछनीय एवम वरेण्य है। वैकल्पिक समाज संरचना की समग्र अवधारणा वैचारिक उदात्तता, सहिष्णुता एवम् समन्वयमूलक मानव परिवार के महनीय आदर्शों तथा भावभूमिका पर केन्द्रित है। मेरी दृष्टि में वैकल्पिक समाज संरचना की अवधारणा समाज के विविध अंगों, क्षेत्रों तथा कार्य व्यवस्थाओं को एकांगी दृष्टि से व्याख्यायित करने का उपक्रम न होकर समाज पुरूष की समग्र (॥शद्यद्यद्बह्यह्लद्बष्) व्याख्या है। यह महायात्रा विराट एकाकार है न कि समाज रूपी व्यक्तित्व की इकाइयों का खंडित अध्ययन। समाज वृहत्त इकाई है तथा उसकी परिधि में समुदाय, धर्म, अर्थ-जगत, राजनीति, सत्ता, संपदा नैतिकता तथा अन्यान्य समस्त क्षेत्र समाहित होते चले जाते हैं अत: समाज संरचना की वैकल्पिक दृष्टि पर विचार एकात्म, अनेकान्त एवम निराग्रह की विचार त्रिपुटी के आलोक में किया जा सकता है।
हमारे जीवन के तीन महत्वपूर्ण पक्ष सत्ता, संपदा और नैतिकता में सन्तुलन बना रहे। यह सन्तुलन समाज के सुस्वास्थ्य एवम सुमंगल हेतु अपरिहार्य है। राजनैतिक एवम आर्थिक क्षेत्र प्रामाणिक, पारदर्शी एवम न्यायसंगत बने इस हेतु जन सामान्य की उदासीनता एवम् तटस्थता टूटे तथा समाज के प्रति उतरदायित्व का बोध उत्पन्न हो। आज अपेक्षा है कि हर व्यक्ति राजनीति एवं अर्थनीति का मूकदृष्टा या उदासीन घटक न बनकर उस व्यवस्था के सकारात्मक कार्य व्यवहार का सक्रिय तंत्र बने। अत: नैतिकता की पुर्नप्रतिष्ठा वैकल्पिक समाज रचना के विचार का मूल मंत्र बन सकता है। आत्मानुशासन से प्रेरित स्व-अनुशासन (्ह्वह्लश स्द्गद्यद्ध - ष्ठद्बह्यष्द्बश्चद्यद्बठ्ठद्ग) समाज जीवन में आंतरिक निष्ठा, आंतरिक अनुशासन एवम आत्म-विश्वास की लौ जला सकता है। हम एक ऐसे आदर्श समाज रचना की दिशा में चिन्तन करें जहाँ सारे कृत्रिम अवरोध समाप्त होकर व्यक्ति के समग्रतम भौतिक एवम् आध्यात्मिक अभ्युदय का विचार हो। महात्मा गांधी ने सादगी, सच्चरित्रता एवम् नैतिकता पर बलपूर्वक आग्रह किया। वे स्वयं सादगी से रहे और आसपास के वातावरण को भी सादगीमय बनाए रखा। आचार की छोटी-छोटी बातों पर गहरी सूक्षमता से ध्यान दिया। एक बार दो पैसों की गड़बड़ को लेकर महादेव भाई को इतना उलाहना दिया कि सुनने वाले आश्चर्य में पड़ गये। एक श्रोता ने कहा-महात्माजी! दो पैसे के लिए आप इतना उलाहना दे रहे हैं, यह क्या अच्छा है? ''महात्माजी ने कहा-प्रश्न दो पैसों का नहीं है, प्रश्न सार्वजनिक पैसों का है। प्रश्न हमारे चरित्र का है उसमें दो पैसे की भी गड़बड़ होती है तो उससे विश्वास को धक्का लगता है। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि चरित्र का प्रश्न कभी वैयक्तिक नहीं है, वह सामाजिक है।'' चरित्रहीन व्यक्ति के द्वारा समग्र समाज जीवन प्रदूषित होता है, यहां तक कि राष्ट्र व अंतर्राष्ट्रीय जगत भी अछूता नहीं रहता हम इस भेदरेखा को मिटाकर कि व्यक्ति का एक जीवन होता है व्यक्तिगत और दूसरा जीवन होता है सामाजिक, एक समग्र समाज की रचना कर सकते हैं जीवन को इस प्रकार खंण्डित नहीं किया जा सकता। जीवन एक और अखण्ड है। व्यवहार आचरण में फलित होता है और व्यवहार दूसरों के प्रति होता है, इसलिए व्यवहार और आचरण के बीच कोई लक्ष्मण-रेखा नहीं खींची जा सकती। हम समाज संरचना की ऐसी एकात्मक संकल्पना से सम्यक समाज निर्माण की दिशा में प्रस्थान कर सकते हैं। एक ऐसे आदर्श समाज की रूपरेखा जिसमें बाह्य-सत्ताएँ कम से कम हो तथा व्यक्ति के आत्मानुशासन से नियंत्रित स्व-आत्मसत्ता नैतिक शक्ति से अनुप्राणित हो।
आज वाँछनीय है विकास की समस्त प्रक्रिया में मनुष्य को केन्द्रीभूत घटक मानने की। चाहे फिर वो आर्थिक विकास की नित नई बदलती संकल्पाएं हों या फिर ज्ञान विज्ञान के नित नये उदघाटित क्षेत्र हों, उनका मुख्य सरोकार मानवीय परिष्कार ही होना चाहिए। एक ऐसे समाज में जो मानवीय एक्य की भावना से अनुप्राणित हो वहाँ सापेक्षवाद एवम् अनेकान्तवादी दृष्टिकोण से विचारधारात्मक वैमनस्य को मिटाकर विश्व एवं समाज व्यवस्था को संचालित किया जा सकता है। अनेकान्त मानवीय एकीकरण का महत्तर सिध्दान्त है। इसे जागतिक समस्याओं के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। विचारधारात्मक दुराग्रह एवम नकारात्मक हठधर्मिता की विश्वव्यापी समस्या ने जहां समग्र मानवीय व्यक्तित्व को खण्ड-खण्ड कर दिया है, वहीं संघर्ष की एक नई संस्कृति को भी हवा दी है। ऐसे निर्मम होते समय में मानवीय एवम् सापेक्षवाद, सहअस्तित्व एवम स्यादवाद की विचार भित्ति पर अभिनव समाज का निर्माण सुनिश्चित कर सकते हैं। हमारी वर्तमान शिक्षा पध्दति में आमूलचूल परिवर्तन कर हम समाज व राष्ट्र का बहुत बड़ा कल्याण कर सकते हैं। आंतरिक व्यक्तित्व समाज के चरित्र को सर्वाधिक प्रभावित करता है। इस समस्या को सुलझाने का दायित्व नई दिशा से मंडित शिक्षा संस्थान बखूबी उठा सकते हैं। ज्ञान संस्थान व्यक्तित्व की सम्पूर्ण निर्मित्ति के साथ स्वतंत्र विचार का विकास तथा जिज्ञासा वृत्ति के विकास में महत्वपूर्ण घटक बन सकते हैं। समाज विचारों का क्रियात्मक पुंज है। जैसी विचार सम्पदा वैसा ही समाज। समाज रचना का तथा समाज की समस्याओं का अध्यात्ममूलक समाधान मंथर जरूर हो सकता है लेकिन होगा चिरस्थायी। यह हमारे चिन्तन का बड़ा सूत्र हो सकता है।
आज की समस्त लड़ाई परिग्रह (्ष्ष्ह्वद्व ह्वद्यड्डह्लद्बशठ्ठ) की लड़ाई है, सत्ता और वैभव की लड़ाई है। कुछ लोग सत्ता और धन पर अपना एकाधिकार करना चाहते हैं या बनाए रखना चाहते हैं। शेष समाज ऐसा नहीं करने देना चाहता। एक विषमतापूर्ण समाज व्यवस्था का विरोध करता है। वह सत्ता, धन और वैभव का सन्तुलन या समाजीकरण, सार्वजनीकरण चाहता है। अपरिग्रह बहुत बड़ा मंत्र है जो ममत्व के विसर्जन का दर्शन है। पूज्य महात्मा गांधी ने कहा था 'यह धरती सभी की आवश्यकताओं की आपूर्ति कर सकती है लेकिन किसी एक के भी लालच की पूर्ति नहीं कर सकती।'
यही मार्ग सही लगता है कि व्यक्ति-व्यक्ति बदले। बदलने की प्रक्रिया भीतर से शुरू हो। मानसिक रूपान्तरण घटित हो, चेतना का परिष्करण हो, एक स्वस्थ भावभूमि का निर्माण हो। कहा भी है- सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, राष्ट्र स्वयं सुधरेगा एक सम्यक दृष्टिकोण, सम्यक, दर्शन पर आधारित समतावादी समाज संरचना अथवा वैकल्पिक समाज निर्माण की दिशा में बढ़ने से पूर्व समता के सूत्र पर दृष्टिपात करना होगा। जिस प्रकार का समाज बनता है उसकी अभिव्यक्ति दर्शन में होती है। सबसे बड़ी अपेक्षा है-सम्यकदर्शन की, सम्यक, दृष्टिकोण की। हमारा एक उद्देश्य होना चाहिए-स्वस्थ समाज की रचना किन्तु राजनीति से परे। अहिंसा और समता के संदर्भ में समाज संरचना की नई दृष्टि का विकास। समतावादी समाज संरचना के विकास हेतु समता के दोनों पक्ष व्यक्तिगत समता तथा दूसरों तक पहुंचने वाली समता पर हमें संतुलित चिंतन करना है। सम्यक दर्शन से, सिध्दांत के द्वारा और अभ्यास की सिध्दि से प्रथमत: व्यक्ति के जीवन में समत्व आए और समत्व से भावित व्यक्ति समाज में समत्व के सेतु का कार्य करे और दूसरों को जोड़ने का कार्य करें। पहला वृहद कार्यक्रम है: नई समाज संरचना की दृष्टि वाले दर्शन से सम्पूर्ण समाज के शिक्षण प्रशिक्षण का। जो संकल्पना स्वस्थ समाज की हम बनाये उसका समाज में वृहत्तर सैध्दान्तिक शिक्षण हो। दूसरा स्तर है-क्रियात्मक स्तर। इसका मूलभूत कार्यक्रम हो सकता है-कार्यकर्ता निर्मा। अभय, कष्ट सहिष्णुता और समत्व के साधक कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या किसी भी सकारात्मक परिवर्तन का निमित्त बन सकती है। महात्मा गांधी के समस्त सिध्दान्त एवं उनके दर्शन का उत्स मानवीय गरिमा, मानवीय आत्म सम्मान एवं मानवीय संवेदन की उर्वर जमीन से उत्पन्न है। समाज निर्माण में महात्माजू की दृष्टि आध्यात्मिक एवं आत्मिक शक्ति के अम्यूदय से गहरी जुड़ी हुई है अत: मानवीय, भौतिक, जागृतिक एवं सामाजिक समस्याओं का आध्यात्मिक समाधान एक तेजोमय, वीर्यवान एवं अप्रमादी समाज की दिशा में सार्थक कदम उठाया जा सकता है। वैकल्पिक समाज में बुध्दिजीवियों का वरेण्य योगदान हो सकता है लेकिन बुध्दिवादी समाज के साथ एक नैतिक समाज व्यवस्था का भी उदय हो जो बुध्दि पर विवेक का तथा सत्ता पर धर्म एवं नैतिकता के युक्ति संगत नियंत्रण से अनुप्राणित हो।
बी-92, गोपालपूरा के पास, जयपुर
मो. 9414391211


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