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सर्वजीवहितावह ग्रंथ : शिक्षापत्री

डॉ. दीक्षित परमार
अभिनव गीता कहा जा सके ऐसा सर्वजीवहितावह ग्रंथ 'शिक्षापत्री' स्वामिनारायण संप्रदाय का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। यद्यपि स्वामिनारायण संप्रदाय का मिशन आध्यात्मिक फलक से संबंधित है फिर भी वह समाज को नहीं भूला है। इसी बात का सचोट उदाहरण है 'शिक्षापत्री'। भगवान स्वामिनारायण ने आचारशुध्दि, चरित्रशुध्दि, नैतिकता, स्वच्छता, व्यवहार, आदि तथा अपने संप्रदाय के भक्तों के लिए जो विशेष नियम दिये हैं, उनका सहज संपुट है 'शिक्षापत्री'। शिक्षापत्री के ये नियम सिर्फ संप्रदाय में मानने वाले व्यक्तियों के लिए ही सीमित न रहकर उन सभी मनुष्यों के लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण बन जाते हैं जो नैतिकता और चरित्र को महत्ता देते है। इस दृष्टि से 'शिक्षापत्री' विश्व पट पर श्वास लेते सभी मनुष्यों के लिए आत्मसात करने योग्य है। गीता का संदेश सुनाते समय भगवान श्रीकृष्ण के सामने सिर्फ अर्जुन ही नहीं बल्कि विश्व के समग्र मुमुक्ष थे अत: गीता का संदेश सभी के लिए है। उसी प्रकार 'शिक्षापत्री' लिखते समय भी भगवान स्वामिनारायण के समक्ष विश्व का समुदाय था।
स्वामिनारायण संप्रदाय के प्रवर्तक भगवान स्वामिनारायण ने स्वयं सन् 1926 में (संवत् 1882 में बसंत पंचमी के दिन) गुजरात के वड़ताल गांव में 'शिक्षापत्री' की रचना की। अपनी विद्वता और समाज कल्याण की भावना से उच्च शास्त्रों के 3949 संदर्भो को समविष्ट करती हुई 'शिक्षापत्री' भगवान स्वामिनारायण की समाज को अमूल्य भेंट है। मनुष्य के आचार, विचार, आहार और विहार शुध्दि के नियमों को संक्षिप्तता और सूक्ष्मता से प्रस्तुत करनेवाली 'शिक्षापत्री' 'बिंदु में सिन्धु' की उपमा को यथार्थ सिध्द करती है।
आज से 182 वर्ष पूर्व जब 'शिक्षापत्री' की रचना हुई, उस समय के भारत की धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थिति सोचनीय थी। धर्म के नाम पर अधर्म का आचरण हो रहा था। अंधश्रध्दा और वहम लोगों के भीतर खौफ उत्पन्न कर रहे थे। समाज में नैतिक मूल्यों का हृास हो रहा था। अंग्रेजी नीति के कारण राजनीतिक भविष्य भी अंधकार में खो रहा था। ऐसे समय में जनता को सही राह दिखाने के लिए आचार-संहिता युक्त 'शिक्षापत्री' ग्रंथ की रचना करके भगवान स्वामिनारायण ने समाज के लोगों का सही दिशा निर्देशन किया।
भगवान स्वामिनारायण ने अपने समाज में फैले दूषणों को निकालकर समाज को सही दिशा में मोड़ा। उस समय के अंग्रेज अधिकारी भी इस बात को देखकर आश्चर्य से भर गये थे। भगवान स्वामिनारायण के कार्यों से प्रभावित कलकत्ता के लोर्ड बिशप रेवरन्ड रेजिनाल्ड हेबर जो सन् 1825, 26 मार्च को नड़ियाद में भगवान स्वामिनारायण से मिले थे, इस प्रभाव को देखकर लिखते हैं कि - (खेड़ा जिले के) कलक्टर विलियम्स ने (मि. थोम्स विलियम्स) मुझे बड़ौदा में कहा था कि हिन्दू सुधारक स्वामिनारायण के सदुपदेशों व लोकप्रियता ने निम्न कक्षा की जंगली प्रजा को भी सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।..... शास्त्रों से सीख सके ऐसी नैतिकता से भी उनकी नैतिकता अधिक उच्च थी।''
आचारसंहिता से पूर्ण अपने उपदेशों से भगवान स्वामिनारायण ने अपने समाज में नि:शस्त्र क्रांति की थी। यह देखकर मुंबई के गवर्नर सर जोहन मालकम इस कार्य प्रवृत्ति से काफी प्रभावित हुए थे। उन्होंने अपने अधिकारियों से भगवान स्वामिनारायण से मिलने की उत्कंठा प्रकट की थी। 20 फरवरी 1830 को भगवान स्वामिनारायण से स्वयं द्वारा रचित ग्रंथों की मांग की थी। भगवान स्वामिनारायण ने उन्हें 'शिक्षापत्री' उपहार में दी थी। इस 'शिक्षापत्री' को राजकोट के ब्रिटिश पोलिटीकल एजेन्ट मि. ब्लेन ने इंग्लैन्ड की ऑक्सफोर्ड लायब्रेरी को दे दिया था। यह शिक्षापत्री आज भी ऑक्सफोर्ड लायब्रेरी के एक विभाग-इन्डियन इन्स्टीयूट लायब्रेरी में आदरपूर्वक रखी गयी है।
अपने विशुध्द व्यक्तित्व और समाज कल्याण की भावना से युक्त भगवान स्वामिनारायण ने समाज में से वर्णभेद, व्यसन, अंधश्रध्दा आदि को दूर कर समाज को शुध्द और चरित्रवान बनाया। परिणाम स्वरूप श्रीहरि को इस नवयुग के निर्माण के लिए घोर अपमान भी सहन करना पड़ा। फिर भी वे 30-30 वर्ष तक अपने कर्मक्षेत्र गुजरात के गाँव-गाँव में घूमते रहे। अपने ऐश्वर्य, असाधारण भगवतप्रतिभा तथा लोकहित की भावना से विचरण करते रहे और सफल भी हुए। ओक्सफोर्ड युनि. इंग्लैंड से सर मोनियर विलियम्स सन् 1887 में लिखते हैं कि ''(भगवान स्वामिनारायण ने) नैतिक चारित्र्य तथा अन्य सदगुणों का संयोग किया, वास्तव में यही उनकी सफलता का रहस्य है। और इसकी कारण से वे अद्वितीय पथ प्रदर्शक सिध्द हुए है। उनके अनुयायी इतनी तेजी से बढ़ रहे थे कि सत्ताधारी पक्ष भी उनकी ख्याति की इर्ष्या करने लगे थे।''
प्रसिध्द गांधीवादी चिंतक किशोरलाल मशरूवाला कहते हैं - ''हजारों मनुष्यों के जीवन में आसमान-जमीन का अंतर कर देने में, उनमें नया चैतन्य भरने में, उन्हें व्यसनों के बंधन से मुक्त करने में बुध्द के अलावा किसी भी धर्म-संस्थापक, समाज-सुधारक या विधि-निर्माता ने अभी तक इतना यश प्राप्त नहीं किया। ब्रह्मलीन होने के पश्चात ही साधारणतया मनुष्यों ने उनका अवतारीरूप कुबूल किया हैं, ऐसा सामान्यत: प्रतीत होता है। किन्तु सहजानंद को उनके जीवनकाल में ही हजारों मनुष्यों ने अवतार के रूप में स्वीकार किया।..... उन्होंने रावण व कंस के समान काम-क्रोध जैसे अंत: शत्रु को मारा था। पाप के पर्वत हटाकर हजारों के चित्त निर्मल किए। यह अवतारी के रूप में उनकी महानता थी। तथा ''अपने प्रकाश से अनेक हृदय में प्रकाश पहुंचाने वाले, अनेकों के चित्त को आकर्षित कर उन्हें गुरूवचन में सर्वस्व अर्पण कर सके ऐसा तत्पर व स्ववश कर देनेवाले...निरंकुश तथा स्वच्छंदी बने त्यागाश्रम को उावल करनेवाले, पतित हुए गुरूओं तथा आचार्यों को संयम का आदर्श दिखानेवाले..शुध्द भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग के प्रवर्तक, भागवत धर्म के शिक्षक और व्याससिध्दांत के बोधक ऐसे थे सहजानंद स्वामी।''
ऐसे अद्वितीय प्रतिभा के धनी भगवान स्वामिनारायण ने संस्कृत के सिर्फ 212 श्लोकों में 'शिक्षापत्री' ग्रंथ में मानव जीवन के सदाचार, व्यवहार, नैतिकता, तत्वज्ञान, धर्मशास्त्र, मानव धर्म आदि के साथ-साथ गृहस्थ के धर्म, स्त्रियों के धर्म, साधु-ब्रह्मचारी के धर्म, संप्रदाय के आचार्यो के धर्म, शासक के धर्म सम्बन्धी तथा संप्रदाय के विशेष नियमों का अति स्पष्टता एवं संक्षिप्तता से संकलन किया है। इस दृष्टि से 'शिक्षापत्री' प्रत्येक धर्म और आश्रम, स्त्री और पुरूष, व्यापारी और साधु-ब्रह्मचारी, विद्वान और निरक्षर आदि सभी के उच्चजीवन सम्बन्धी नियमों को अपने में समाये हुए हैं। इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि इसमें कहीं जटिलता नहीं है। शिक्षापत्री का अनुवाद विश्व की 26 भाषाओं में हुआ है।
विद्वतभाषा में लिखी गयी इस 'शिक्षापत्री' के विषय में स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम गृहप्रधान सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा था कि- ''देश के लोग यदि 'शिक्षापत्री' की आज्ञाओं का पालन करें तो इस देश में कानून, पुलिस और अदालतों की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी।''
प्रख्यात विद्वान एस. सुब्रमण्य शास्त्री ने 'शिक्षापत्री' की महत्ता को पहचानते हुए कहा था कि 'शिक्षापत्री' हर कोई इसे अपने जीवन में स्थान दे सके ऐसा यह ग्रंथ उदाहरणरूप है। गीताज्ञान के लिए प्रयुक्त शब्द 'सुख कर्तुम'- जीवन के लिए सुलभ और अनुसरणीय 'शिक्षापत्री' के लिए भी यथार्थ ही है।'
सर मोनियर विलियम्स ने भी 'शिक्षापत्री' को एक आदर्श ग्रंथ मानते हुए स्पष्ट किया है- 'इस ग्रंथ के आदर्श अतिशय पवित्र और चरित्रशील जीवन के लिए है।'
अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी ने तो 'शिक्षापत्री' के एक-एक नियमों को सुदर्शनचक्र की तरह शक्तिशाली मानते हुए कहा है-'शिक्षापत्री' के एक - एक नियम में सुदर्शनचक्र की शक्ति समायी हुई है। जिस प्रकार भक्तों की रक्षा में श्रीकृष्ण का सुदर्शन रहता है।' इसीलिए 'शिक्षापत्री' के प्रारंभ में भगवान स्वामिनारायण ने लिखा है-

समस्तशास्त्रदुग्धाब्धिमध्योध्दृतमनुत्तमम्।
शिक्षापत्र्यमृतं किञ्चदमृतत्वाय कल्पते॥

आज के वैज्ञानिक युग में शिक्षापत्री की आवश्यकता क्यों है-इस बात का उत्तर हमें नोबल पारितोषिक विजेता डॉ. कोर्नाल लेरीन्स के इन शब्दों में मिलता है। अपनी पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि -% ढ्ढ ङ्ढद्गद्यद्बद्ग1द्ग ढ्ढ ध्दड्ड1द्ग द्धशह्वठ्ठस्र ह्लध्दद्ग द्वद्बह्यह्यद्बठ्ठद्द द्यद्बठ्ठद्म ङ्ढद्गह्ल2द्गद्गठ्ठ ड्डठ्ठद्बद्वड्डद्यह्य ड्डठ्ठस्र ष्द्ब1द्बद्यद्ब5द्गस्र द्वड्डठ्ठ. ढ्ढह्ल द्बह्य 2द्ग+ - अर्थात् मुझे पशु और सुसंस्कृत मनुष्य के बीच की खोयी हुई कड़ी का पता लग गया है। वह है हम। आज के वर्तमानयुग में हम कहाँ खड़े हैं? इस विषय में वे कहते हैं - 'हम न तो पशु है और न मनुष्य। हमारी परिस्थिति त्रिशंकु जैसी बन गयी है। हमारे जीवन में से मर्यादा का स्थान लुप्त हो गया है। चोरी, लूट, व्यभिचार आदि अनेक दुर्गुणों से लोकमानस संपूर्ण भर गया है। साथ ही अपने समाज की बात करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि हम भी समाज का ही एक अंग है।'
आज के समाज में मनुष्य की वृत्ति किस हद तक हीन और स्वार्थी हो चुकी है, इसके संदर्भ में एक उदारहण प्रसिध्द है-'एक बार जंगल में मनुष्य रास्ता भूल गया। रात्रि के समय में वह एक व्याध्र को देखकर वृक्ष पर चढ़ जाता है, वहां एक बंदर ब्याध्र से अपनी जान बचाने के लिए बैठा था। बंदर और मनुष्य के नीचे उतरने के इंतजार में व्याध्र वहीं बैठ जाता है। मनुष्य ने बंदर से कहा कि अगर थोड़ी-थोड़ी देर दोनों बारी-बारी से पहरा दे तो सोया जा सकता है। पहले मनुष्य सोया और बंदर ने पहरा दिया। जब मनुष्य की बारी आयी तो नीचे खड़े व्याध्र ने मनुष्य की वृत्ति पहचानते हुए कहा कि अगर वह सोये हुए बंदर को नीचे गिरा दे तो फिर वह उसे छोड़ सकता है। व्याध्र की बात को सुनकर लालच में आकर मनुष्य ने नींद में बेखबर बंदर को धक्का दे दिया..किन्तु भाग्यवश बंदर के हाथ में वृक्ष की शाखा आ जाती है और वह बच जाता है। बंदर ने मनुष्य को पकड़कर कहा कि 'मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुमने मुझसे कपट किया,' मनुष्य डर गया बंदर ने फिर कहा कि 'मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, लेकिन आज के बाद कभी यह मत कहना कि बंदर तुम्हारे पूर्वज थे।'
समाज की गतिविधियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके भगवान स्वामिनारायण ने समाज की उन्नति के लिए 'शिक्षापत्री' में जो नियम दिये है उनमें आज के व्यक्तिगत और सामाजिक अनेक प्रश्नों के सचोट समाधान छिपे है। यहां मानव जीवन के व्यवहार, चरित्र, स्वच्छता आदि के सर्वसामान्य नियमों द्वारा इस बात को स्पष्ट करने का विनम्र प्रयास किया जा रहा है।
आज का मनुष्य अपने जीवन में उन्नति करना चाहता है। वह सुख पाने की दिशा में हमेशा प्रयत्नशील रहता है। किन्तु पुरूषार्थ करने पर भी वह सुख से वंचित रहता है। क्योंकि अगर व्यक्ति के जीवन में व्यसनरूपी छिद्र है तो वह वास्तविक सुख की प्राप्ति कदापि नहीं कर सकेगा। जिस प्रकार कुंए में से पानी निकालने वाले साधन में पहले से ही छेद है तो पानी कुएं में से बाहर आने से पहले ही खाली हो जायेगा। भगवान स्वामिनारायण ने जान लिया था कि व्यसन के वृक्ष को छेदने वाला प्रमुख परिबल है। अत: उन्होंने शिक्षापत्री के 18 वें श्लोक में इस बात का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया है-

व्यभिचारो न कर्तव्य: पुम्भि:स्त्रीमिश्च मां श्रितै:।
द्यूतादि व्यसनं त्याज्यं नाद्यं भग्डादि मादकम्॥18॥

व्यभिचार और व्यसन से दूर रहने की बात को स्पष्ट करता हुआ यह एक सामान्य नियम है किन्तु इस नियम में मनुष्य जीवन की सुरक्षा समा गयी है। आज शराब, सिगरेट जैसे व्यसनों के साथ-साथ मारफीन और मेरीजुआना जैसे मादक द्रव्यों का प्रचलन बढ़ रहा है। भारत और विश्व के प्रमुख देशों के लोग ज्यादा से ज्यादा 'ड्रग एडिक्ट' बनते जा रहे हैं। समग्र विश्व की सरकार के सामने यह प्रश्न उपस्थित हो गया है कि आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? स्वेच्छाचार के कारण आज समग्र विश्व में एड्स ( ्ढ्ढष्ठस्) जैसे संक्रमित भयंकर रोग ने अपना विकराल स्वरूप दिखाना प्रारंभ कर दिया है। इस नियम में श्रीहरि ने जो बात स्पष्ट की है इसमें मनुष्य और विश्व की सुरक्षा ही समायी है।
फैशन की आपाधापी दौड़ में व्यक्ति आज वस्त्र परिधान में अपना विवेक खोता जा रहा है। परिणामत: इसके दुष्परिणाम भी देखने में आ रहे हैं। वस्त्र परिधान जैसी सामान्य बात पर भी भगवान स्वामिनारायण की दृष्टि गयी है। किस प्रकार के वस्त्र परिधान करने चाहिए इस बात को स्पष्ट करते हुए वे 38वें श्लोक में लिखते हैं-

यस्मिन् परिहितेडपि स्युर्दृश्यान्यग्डानि चात्मन:।
तदूष्यं वसनं नैव परिधार्यं मदाश्रितै:॥ 38॥

आज देश-विदेश में क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अत: व्यक्ति कभी-कभी सबकुछ पा-लेने की चाहत में अपना विवेक खो बैठता है। अपने समाज में इस प्रकार के प्रसंग दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे है कि बाद की परिस्थिति का मुकाबला करते-करते व्यक्ति रास्ते पर आ जाता है, अर्थात सबकुछ पा लेने की लालच में वह अपना सुख-चेन भी खो देता है। 'शिक्षापत्री' में श्रीहरि ने आर्थिक प्रश् सम्बन्धी नियम देकर ऐसे कितने ही प्रश्नों का निराकरण कर दिया है। ऐसे प्रश्नों का अतिव्यावहारिकता से हल दिखाते हुए श्लोक 143, 145 और 146 वें वे स्पष्ट करते है-

ससाक्ष्यमन्तरा लेखं पुत्रमित्रादिनाड्पि च।
भूवित्तदानादानाभ्यां व्यवहार्यं न कर्हिचित्॥ 143
आयद्रव्यानुसारेण व्यय:कार्यो हि सर्वदा।
अन्यथा तु महदु:खं भवेदित्यवधार्यताम॥ 145

दैनिक जीवन की नित्यविधि तथा मलमूत्र त्याग, थूंकने तथा स्नानादिक क्रिया के लिए योग्य और वर्ज्य स्थानों के लिए भी 'शिक्षापत्री' में नियम है। यदि व्यक्ति सिर्फ इन नियमों को ही अपने जीवन में स्थान दे सके, तो आरोग्य के साथ-साथ पर्यावरण रक्षा का प्रश्न भी सुलझ जायेगा। 30 और 32 वें नियम में यह बात स्पष्ट है -

अंगालितं न पातव्यं पानीयं च पयस्तथा।
स्नानादि नैव कतव्यं सूक्ष्मजन्तुमयाम्भसा॥ 30॥
स्थानेषु लोकशास्त्राभ्यां निषिध्देषु कदाचन।
मलमूत्रोत्सर्जनं च न कार्यं ष्ठीवनं तथा॥ 32॥

शिक्षापत्री के 11, 12, 13 क्रम के श्लोक में अहिंसा सम्बन्धी बातें है। भगवान स्वामिनारायण ने 'अहिंसा ही परम धर्म है' बात की स्वीकृति देते हुए हिंसकवृत्ति के सामने विरोध प्रकट किया है, यहां तक कि यज्ञ में भी नरबलि और पशुबलि का विरोध प्रकट करते हुए शुध्द अहिंसक यज्ञों का प्रचलन किया। हिंसकवृत्ति से छोटे-छोटे सामान्य जंतु की हिंसा पर भी आपत्ति प्रकट की है-

कस्यापि प्राणिनो हिंसा नैव कार्याड्त्र मामकै:।
सूक्ष्मयूकामत्कुणादेरपि बुध्दया कदाचन॥ 11॥
देवतापितृयागार्थमप्यजादेश्चहिंसनम्।
न कर्तव्यमहिंसैव धर्म: प्रोक्तोडस्ति यन्महान्॥ 12॥

श्लोक 140 और 141 में पशुदया पर भी अपने विचार प्रकट कर दिये हैं। 'स्वपरद्रोहजननं सत्य भाष्यं न कर्हिचित' कहकर सूक्ष्महिंसा से दूर रहने का भी संकेत दे दिया है।
समाज में फैल रहे धार्मिक वैमनस्य की ओर भी श्रीहरि की दृष्टि रही है। इस वैमनस्य को दूर करने के लिए अपने भक्तों को आज्ञा देते हुए वे शिक्षापत्री के 23वें और 84 वें श्लोक में स्पष्ट करते हैं-
दृष्टा शिवालयादीनि देवागाराणि वर्त्मनि।
प्रणम्यं तानि तद्देवदर्शनं कार्यमादरात्॥ 23॥
विष्णु: शिवो गणपति:पार्वती च दिवाकर:।
एता:पूज्यतया मान्या देवता: पञ्च मामकै:॥ 84॥

यहाँ भगवान स्वामिनारायण की समन्वयवादी दृष्टि के दर्शन होते है।
व्यसन, व्यभिचार, व्यावहारिकता, स्वच्छता, आरोग्य आदि से सम्बन्धित शिक्षापत्री के सामान्य नियमों में आज के कितने ही व्यक्तिगत और सामाजिक प्रश्ों का निराकरण छिपा हुआ है। इन सर्वसामान्य नियमों को भी हम जीवन में स्थान दे सके तो कितनी ही समस्याओं का समाधान स्वयं हो जायेगा।
शिक्षापत्री के नियम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन पुरूषाणर्थ चतुष्टय पाने की कुंजी के समान है।
आहार, व्यवहार, विचार, विहार आदि के सम्बन्ध में मार्गदर्शन देती शिक्षापत्री हमें जीने का विवेक सिखाती है।

तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्योकार्ये व्यवस्थितौ

गीता (1624) में कही गई यह बात शिक्षापत्री पर पूर्ण रूप से लागू होती है।
ईश्वर तत्त्व में न मानने वाले देश भी अपने देश को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए आचार-संहिता की रचना करते ही है। यहां तक की टी.वी., कम्प्यूटर आदि जैसे साधनों को चलाने के लिए पहले उसकी मार्गदर्शिका पढ़नी और समझनी जरूरी होती है। उसी प्रकार अमूल्य जीवन को चलाने के लिए तथा उसका उत्कर्ष करने के लिए शिक्षापत्री जैसी मार्गदर्शिका की आवश्यकता है। शिक्षापत्री के नियम हमारे जीवन को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में सक्षम है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ें वृक्ष का बंधन नहीं जीवन होती है, उसी प्रकार सदाचार के नियम मनुष्य के लिए बंधनरूप नहीं जीवनरूप होते हैं। इस प्रकार समस्त विश्व के मनुष्यों के सुखमय जीवन को सुदृढ़ आधार प्रदान करनेवाला ग्रंथ शिक्षापत्री परमकल्याणकारी एवं सर्वजीवहितावह है।

प्रमुख दृष्टि
35 गुलाब वाटिका, अमीन मार्ग
कालावाड़ रोड, राजकोट-360005


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