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भारतीयता और मार्क्सवाद

डॉ. सरला अग्रवाल
उपर्युक्त पर विचार करते समय सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि 'मार्क्सवाद' क्या है, और भारतीयता क्या? ये दोनों विचारधारायें क्या परस्पर विरोधी हैं और इनका उद्देश्य और आधारभूत सिध्दान्त क्या हैं? इनका प्रादुर्भाव क्यों हुआ? पहले हम मार्क्सवाद को लेते हैं।
प्राचीन काल में राजनीति के क्षेत्र में राजतन्त्र, सामंतशाही और तानाशाही व्यवस्था के चलते मनमाने ढंग से असंख्य निरीह प्राणियों का शोषण होता था। अल्पसंख्यक पूंजीपति, सामन्त तथा उनके प्रतिनिधि बहुसंख्यक साधनहीन निर्धन और विवश जनता का रक्त चूसते थे। जागीरदारी, जमींदारी व्यवस्था जनता के लिए घोर-अभिशाप थे। उस समय जनता का बहुसंख्यक वर्ग जीवनयापन की सुविधाओं के अभाव में मानवोचित विकास से रहित होकर अत्यन्त लाचारी का जीवन जीने के लिए विवश था। समाज का ढांचा विषमता के आधार पर खड़ा था।
उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जर्मनी के प्रसिध्द विचारक कार्ल मार्क्स का उदय हुआ। उसने अपने विचारानुसार पीड़ित, शोषित जनता के उद्वार और पुनर्निमाण के लिए प्रभावशाली सुझाव प्रस्तुत किये। अपनी विचारधारा कार्ल मार्क्स ने विस्तृत रूप से अपनी पुस्तक 'पूंजी' और 'साम्यवादी घोषणा पत्र में प्रकट की।
मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाजवादी विचारधारा के अनुसार उत्पादन के साधन किसी एक व्यक्ति, किसी विशेष वर्ग अथवा संस्था के हाथ में न होकर समस्त समाज के संयुक्त अधिकार में होने चाहिए। मार्क्स के अनुसार प्रत्येक व्यवस्था का आधार उसकी आर्थिक दशा है। समाज की आर्थिक दशा विकारयुक्त होते ही सम्पूर्ण सामाजिक ढांचा रोगग्रस्त होकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।
उदाहरणार्थ, प्रारंभ में जागीरदारों और किसानों के परस्पर सम्बन्ध अच्छे थे, किन्तु जैसे ही समाज में आर्थिक विषमता उत्पन्न हुई, जागीरदारों एवं किसानों में संघर्ष उत्पन्न हो गया। इस संघर्ष के बीच एक नए वर्ग-पूंजीपति वर्ग का उदय हुआ, जिसकी सहायता से उत्पीड़ित कृषक, मजदूर वर्ग ने जागीरदारी समाज का उन्मूलन किया।
इसके पश्चात पूंजीवाद का नवीन युग आरंभ हुआ। पूंजीपतियों ने शीघ्र ही उत्पादन के साधनों पर आधिपत्य जमा कर बहुसंख्यक कृषक एवं मजदूर वर्ग का शोषण आरंभ कर दिया। इससे पूंजीपति और श्रमिकों के बीच संघर्ष रहने लगा। आगे चलकर यह पूंजीवाद ही साम्राज्यवाद का आधार बना, जिसके कारण विश्व में अनेक भयानक युध्द हुए एवं मानवता का संहार हुआ।
इस विवेचन से कार्ल मार्क्स ने निष्कर्ष निकाला कि समाज का विभिन्न वर्गों में विभाजन ही समस्त विकारों का मूल है। तत्पश्चात मार्क्स के अनुसार एक वर्गविहीन समाज की व्यवस्था की गई। ऐसे वर्गविहीन समाज की, जिसमें न कोई शोषक होगा और न ही शोषित। समस्त उत्पादन और उसका लाभ समाज के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु होगा, किसी व्यक्ति विशेष अथवा वर्ग विशेष के लिए नहीं। समाज अपने प्रत्येक सदस्य की सुख-सुविधा और आवश्यकताओं की पूर्ति का पूरा-पूरा ध्यान रखेगा और समाज का प्रत्येक व्यक्ति यथाशक्ति कार्य करेगा। इस व्यवस्था के अनुसार राज्य शासन की आवश्यकता ही नहीं होगी। मूल रूप में मार्क्स की समाजवादी व्यवस्था की यही रूप रेखा थी।
तभी रूस में लेनिन ने मार्क्स के समाजवाद में अपने अनुभवों के आधार पर कुछ संशोधन और संवर्ध्दन किये। लेनिन के अनुसार वर्गहीन समाज की स्थापना को तत्परता प्रदान करने के लिए संघर्ष और क्रांति आवश्यक थी, जो हड़तालों, प्रदर्शनों तथा सशस्त्र क्रांति द्वारा की जाये, ताकि क्रांति द्वारा पूंजीपति वर्ग के हाथों से सत्ता छीनी जा सके। मार्क्स के वैज्ञानिक समाजवाद का यही क्रांतिकारी नया रूप 'साम्यवाद' कहलाया। समाजवाद तथा साम्यवाद का लक्ष्य एक ही है, शोषण-रहित, वर्गहीन समाज की स्थापना का, जिसमें सामूहिक सहयोग द्वारा उत्पादन वृध्दि हो तथा प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रतापूर्वक अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके।
भारतीयता अत्यन्त व्यापक है। यह किसी एक धर्म, एक सम्प्रदाय, एक वर्ग, वर्ण या समुदाय पर आधारित नहीं है। 'भारत' एक देश का नाम है। भारत में निवास कर रहे सभी व्यक्ति भारतीय हैं। इस कारण यहां के सभी निवासियों के धर्म, पंथ, विचारधारा तथा भाषा का समन्वित नाम है 'भारतीयता' या ये कहें कि यह सब 'भारतीयता' के अंतर्गत हैं। 'भारतीयता' से एक ध्वनि यह भी निकलती है - 'भारतीय' जिन्हें भारत से प्रेम है, जो भारत के लिए समर्पित हैं, जिनमें भारत के प्रति निष्ठा है।
भारत राष्ट्र सनातन है। प्रगति-अवनति, सुख-दुख, अनेक आक्रान्ताओं द्वारा विनाशलीला के बावजूद भारत एक राष्ट्र के रूप में विद्यमान रहा। भौगोलिक सीमाओं की भिन्नताएं होते हुए भी संपूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक सीमा और सांस्कृतिक जीवन मूल्य एक रहे। यही कारण रहा कि भारत में अनेक भाषाएं, अनेक विचारधाराएं, रहन-सहन, रूचियां. परंपरायें, अनेक वर्ण, और वर्ग होते हुए भी हिमालय से कन्याकुमारी तक और काठियावाड़ से आसाम तक साहित्य में भी जीवन मूल्यों के साथ अनुभूति एवं संवेदनाएं भी एक रही। अपना-पराया, छोटा-बड़ा, तेरा-मेरा की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर 'भारतीयता' की सबसे मुख्य विशेषता है 'मानवतावाद', जिसके अंतर्गत समस्त प्राणियों को समदृष्टि से देखा गया है, सभी से एकात्म भाव और विश्व बंधुत्व। 'वसुधैव कुटम्बकम' भारतीयता का महामंत्र है।
विश्व में समस्त जातियों ने समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए 'राजतंत्र को स्वीकारा है किन्तु भारत में उसका आदर्श से ही जनतांत्रिक रहा है। राम का जीवन (उत्तराधिकार में पाये राज्य एवं राजतन्त्र होते हुए भी) जनतान्त्रिक व्यवस्था का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है। उसमें न्याय, जनहित और जनता की आवाज को प्रधानता दी जाती थी। रामराज्य में शोषण का कोई स्थान नहीं हैं। शोषक और शोषित का भेद रह ही नहीं सकता है, क्योंकि रामराज्य की शक्ति और सत्ता का आधार आत्मनियंत्रण और आत्म-शासन है, सैन्य बल नहीं। वहां अधिकारी का गौरव सेवक होने में हैं। सादगी और संयम समस्त व्यवस्था के मूल आधार होते हैं, कर्तव्य पालन का आधार कानून और दण्डमय न होकर आत्म सुधार होता है।
उदारहण अनेक हैं। वेनु पुत्र पृथु को राजा चुनने के पश्चात ऋषियों और विद्वानों ने उसे प्रजा की सेवा करने की शपथ दिलाई थी और कहा था कि जिस कार्य में धर्म की सिध्दि हो वह करना। प्रिय-अप्रिय का विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मोह को दूर हटाकर सब प्राणियों के प्रति समभाव रखना। यह भी कि धर्म से विचलित व्यक्तियों को सनातन (स्थायी) धर्म पर दृष्टि रखकर अपने बाहुबल से परास्त करके दण्डित करना। राजतन्त्र की व्यवस्था अति प्राचीन है फिर भी भारत में गणतन्त्रात्मक पध्दति प्रचलित थी। बुध्द के समय में अनेक गणराज्य देश थे। लिच्छिवियों के राज्य में गणसत्ता पध्दति प्रचलित थी। राजसत्ता नागरिकों के गण अथवा संघ के हाथ में थी किन्तु इस 'गण' का प्रत्येक सदस्य 'राजा' कहलाता था। ये सब 'सघागार' नामक राजभवन में एकत्रित होकर राजव्यवस्था की सामाजिक और धार्मिक समस्याओं का समाधान खोजते थे। ऋग्वेद में इसका उल्लेख है। कौटल्य के काल में तो लगभग सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में ऐसे गणराज्य फैले हुए थे।
भारत की राष्ट्रीयता सांस्कृतिक रही। इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद अथवा भारतीयता ने देश में चार धाम, चार शक्ति पीठ, बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना करायी है, जो देश के विभिन्न भागों में बिखरे हुए हैं। उत्तर में अमरनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिका। यह सभी 'भारतीयता' के प्रमाण है।
'भारतीयता' को समझने के लिए भारतीय जीवन दर्शन को समझना अत्यन्त आवश्यक है। इसके आधारभूत सिध्दान्त हैं - सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह और अभय। 'भारतीयता' व्यक्ति और समाज के बीच की आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक - सभी समस्याओं का निराकरण इन्हीं आधारों पर खोज निकालने का प्रयास करती है। सत्य और अहिंसा के लिए जो कार्य किये जाते हैं, वे सत्याग्रह हैं।
'भारतीयता' का जन्म किसी राजनैतिक परिस्थिति में किसी संगठन या व्यक्ति के द्वारा नहीं हुआ। यह मानव जाति के लाखों वर्षों के अनुभवों का परिणाम है। यह किसी व्यक्ति विशेष पर अवलंबित नहीं, जैसे समाजवाद और साम्यवाद मार्क्स और लेनिन की विचारधारा पर हैं। भारत में समय-समय पर अनेक ऋषि-मुनि, साधु-संत हुए हैं। सभी उच्चकोटि के धुरंधर निष्णात विद्वान थे। कपिल, कणाद, गौतम, पतंजलि, कौटिल्य तथा व्यास के साथ ही अन्य अनेक! उनमें विचारों की विभिन्नता होने पर भी जीवन मूल्यों के प्रति आग्रह एवं शाश्वत सत्य वहीं है, क्योंकि भारतीय जीवन दर्शन सत्य की खोज, ज्ञान की वृध्दि तथा ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिए विकसित हुआ है।
गांधीवाद को 'भारतीयता' की संज्ञा दी जा सकती है क्योंकि मानवता के महान-दृष्टातों और संतों में महात्मा गांधी के महत्वपूर्ण स्थान और प्रभाव को समस्त विश्व स्वीकार करता है। गांधीवाद मूलत: मानवतावादी दर्शन है। इसमें विश्व-बंधुत्व की भावना अन्तर्निहित है। पाश्चात्य विज्ञान के विध्वंसकारी स्वरूप और महायुध्दों की विभीषिका से त्रस्त मानवता के लिए गांधीवाद एक आदर्श शरण-स्थल है।
समाज की आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए गांधीवाद अहिंसा के सिध्दान्त में ही विश्वास रखता है। गांधीवाद मार्क्स के वर्ग संघर्ष में विश्वास नहीं रखता। समाज की आर्थिक कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्ष की नहीं, वरन हृदय परिवर्तन की आवश्यकता होती है।
मार्क्सवाद पूंजीपतियों को नियंत्रण में रखने के लिए सशस्त्र क्रांति पर बल देता है किन्तु भारतीयता पूंजीपतियों के हृदय परिवर्तन का साधन प्रचार, आत्म-पीड़न तथा आत्मशुध्दि जैसे उपायों को प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुत करने को मानती है। समाज के आर्थिक ढ़ांचे को व्यवस्थित करने के लिए गांधीवाद आत्मनिर्भरता पर बल देता है। प्रत्येक व्यक्ति अपना कार्य स्वयं करें। अपने लिए अन्न स्वयं उपजाए तथा अपने वस्त्रों के लिए सूत स्वयं काते। कुटीर उद्योग धन्धों को प्रोत्साहन देकर सामान्यजन की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया जाये।
'भारतीयता' समाजवाद को लेकर चलती है और हर क्षेत्र में अति से बचती है। भारतीय पध्दति में जो जितना श्रम करे, उतना ही लाभ पाये। अधिक श्रम का फल अधिक उत्पादन, अधिक लाभ। मार्क्स का समाजवाद तथा लेनिन का साम्यवाद अति होने के कारण ही मुंह के बल गिरे। उनका हर दांव उल्टा पड़ा, पर भारतीयता ने सदैव बीच का मार्ग अपनाया। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार हमें अपनी संस्कृति ऐसी बनानी चाहिए कि जिससे धन संग्रह की रूचि ही उत्पन्न न हो। वह व्यक्ति में लोभ-मोह को त्यागने के गुण उत्पन्न करती है। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठने की शक्ति देती है।
भारतीय जीवन पध्दति ने हर व्यक्ति के लिए जीवन में चार आश्रम - ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम एवं सन्यासाश्रम स्थापित करके समाजवाद का एक ऐसा अनुपम आदर्श विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया है जो उनकी विवेक बुध्दि को सदा के लिए अमर कर गया। इससे हर व्यक्ति जीवन भर संतुलित रहता है।
भारतीयता 'व्यक्ति' की उन्नति के लिए सिध्दान्त रूप में व्यक्तिवादी है किन्तु व्यवहार रूप में समष्टिवादी। कोई व्यक्ति मतभेद रखते हुए अपने विरोधी विचार भी अपने बड़ों के सम्मुख निर्भय होकर व्यक्त कर सकता है किन्तु यदि पंचायत ने कोई निर्णय ले लिया हो, तो व्यक्ति के लिए 'समष्टि' के साथ चलना उसकार् कत्तव्य हो जायेगा। किन्तु मार्क्सवाद में वैयक्तिक स्वतंत्रता के लिए कोई स्थान नहीं है, वहां भी जनता को संघ का अंधानुकरण करना और उनके प्रशस्ति गीत गाते रहना आवश्यक होता है। विचारशील बुध्दिजीवियों के लिए वहां कोई स्थान ही नहीं है, न ही उमादी आलसी व्यक्तियों के सम्मुखर् कत्तव्यनिष्ठ कर्मठ व्यक्तियों को सम्मान। गधे-घोड़े सभी एक भाव!
इस प्रकार मार्क्सवाद और भारतीयता के 'समाजवाद' में आधारभूत अन्तर है। मार्क्सवाद अथवा साम्यवाद जो कार्य हड़ताल, प्रदर्शन और सशस्त्र क्रांति से विरोध प्रदर्शन के साथ करता है, वही कार्य 'भारतीयता' अपने सिध्दांतों और जीवन मूल्यों में इस प्रकार पिरोये रहती है कि वह स्वयमेव होता चलता है। वर्ण व्यवस्था को भी इसी 'कर्म पध्दति' को संपन्न करने के लिए ही बनाया गया है, ताकि समाज का हर व्यक्ति अपना-अपना कार्य उत्साहपूर्वक करता रहे - जैसे अध्ययन-अध्यापन का कार्य ब्राह्मण, व्यापार-दुकानदारी के कार्य वैश्य, देश की सुरक्षा के कार्य क्षत्रिय तथा सेवा के कार्य शूद्र। इस वर्ण व्यवस्था में आपसी सद्भाव, परस्पर सम्मान और 'कर्म के प्रति आदर का भाव था। विदेशी अपसंस्कृति के आगमन से शनै: शनै: ऐसी स्थिति आ गयी कि अब इनमें आपसी मतभेद उभरने लगे हैं।'
भारतीयता 'अहिंसा परमोधर्म:' पर विश्वास करती है, किन्तु विश्व के मार्क्सवादी देश एक दूसरे की स्वतंत्रता का हनन करने के लिए सदैव तत्पर रहे हैं। पूंजीपति गरीब मजदूरों का रक्त चूसते रहे हैं। उनके पास रखे एटम बम अपनी विकराल शक्ति से इस सुन्दर सृष्टि का नाश करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। ऐसे भयानक वातावरण में भारतीय 'अहिंसा' ही एक ऐसा मन्त्र है, जिसके द्वारा 'द्वेष' और 'घृणा' जैसे तत्वों को भस्म किया जा सकता है। उफनता दूध शीतल जल के छीटों से ही शान्त होता है। अहिंसा में लोक कल्याण और जीव-हित की भावना समायी हुई है, अहिंसा का सच्चा अर्थ समझने वाला देश अथवा व्यक्ति कभी किसी अन्य को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने की नहीं सोचेगा और यही सच्चा समाजवाद है।
'आस्था' 5-बी-20, तलवण्डी,
कोटा 824005 (राज.)


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