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आओ हम भी कुछ ऐसे सोचे

डॉ. वर्मला भम्बरी
एक बार कछुआ और खरगोश दोनों मिले और यह बहस करने लगे कि दोनों में कौन तेज दौड़ता है? दोनों ने निश्चय किया कि बहस से कुछ नहीं मिलेगा और कहा क्यों न दौड़ शुरू की जाये। प्रारंभ में कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था, पर खरगोश बड़ी तेजी से दौड़ा। कुछ अंतर काटकर खरगोश ने देखा, कछुआ तो बहुत पीछे है, इसकी धीमी चाल से कितना चलेगा? वहीं पेड़ के नीचे वह थोड़ा सुस्ताने के लिये बैठ गया। बैठते ही झपकी लगी और वह सो गया। कछुआ धीमी गति से बढ़ता रहा। पेड़ के नीचे सोये खरगोश से वह आगे निकल गया और शीघ्र ही निश्चित स्थान पर पहुंच गया। बस, क्या था , वह प्रतियोगिता जीत गया। जब खरगोश ने तालियों की आवाज सुनी तो वह जागा। उसे एहसास हुआ कि वह हार गया। सच, स्द्यश2 ड्डठ्ठस्र ह्यह्लद्गड्डस्र4 2द्बठ्ठह्य ह्लध्दद्ग ह्मड्डष्द्ग कुछ ऐसी ही कहानी सबने सुनी होगी या पढ़ी होगी। समय के परिवर्तन के साथ घटनाएं बदलती है, तथ्य बदलते हैं। आज के संदर्भ में कहानी को कुछ रोचक रूप में बताया गया। जो कुछ इस प्रकार है। नए संदर्भ में नई सोच।
खरगोश ऐसे तो बुध्दिमान माना जाता है। दौड़ हारने के बाद वह वहीं उदास बैठा था। सब प्राणी आकर तरह-तरह के प्रश् करते। सबको तेज दौड़ने वाला हारा कैसे? यही बात सता रही थी। चुपचाप बैठे खरगोश ने आत्मचिंतन किया कि मैं हार कैसे गया? उसने अंदर की आवाज सुनी कि अति विश्वास, लापरवाही और शिथिलता। खरगोश ने सोचा, यदि इस बात को मैं गंभीरता से लेता तो मैं कभी कछुए से न हारता। वह तुरंत कछुए से मिला और दूसरी दौड़ के लिए चुनौती दी। कछुआ तैयार। इस बार खरगोश बगैर रूके दौड़ता ही रहा...दौड़ता ही रहा और काफी लम्बे अंतराल से खरगोश दौड़ जीत गया।
संदेश : तेज एवम् अविरत गति से दौड़ने वाला धीमी एवं स्थिर गति से दौड़ने वालों को हरा देता है। यदि संस्था में दो व्यक्ति हों जिनमें एक धीमा, रीतिबध्द एवं विश्वसनीय हो और दूसरा तेज और विश्वसनीय हो तो तेज और विश्वसनीय संस्था में आगे रहेगा। धीमापन और स्थिरता अच्छे गुण हैं लेकिन तेजी और विश्वसनीयता अधिक अच्छे हैं।
कहानी का यहां अन्त आ गया। यह न सोचें। कछुए ने भी आत्मचिंतन किया एवं अहसास किया कि निर्धारित ढांचे की दौड़ में खरगोश को हरा पाना संभव नहीं। कछुआ धीरे-धीरे खरगोश के पास पुहंचा और कहा, दोस्त क्यों न हम दूसरी बार दौड़ लगाएं? दूसरी बार दौड़ की शर्त लगाई, लेकिन कुछ अलग मार्ग से। दोनों ने मार्ग बदलना स्वीकार लिया था। खरगोश ने खुश होकर दौड़ शुरू की। पहले तो वो तेजी से दौड़ा, लेकिन रास्ते में नदी देखकर कुछ ठिठका और आगे आकर रूक गया। निर्धारित स्थान नदी के सामने किनारे से दो किलोमीटर दूर था। वह चुपचाप वहां बैठकर सोचने लगा कि अब क्या किया जाये? उसी समय कछुआ नदी को पार कर अपने निर्धारित स्थान पर पहुंचकर दौड़ जीत गया।
संदेश : सर्वप्रथम अपनी क्षमता को पहचानो और तदनुसार कार्यक्षेत्र को चुनकर अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करो।
आप सोचते होंगे, कछुए ने राह बदल कर जीत पा ली और खरगोश से बदला ले लिया। पर आपकी सोच भी योग्य दिशा में नहीं। कहानी यहां भी समाप्त नहीं होती। कछुआ और खरगोश दोनों अच्छे दोस्त बन गए। दोनों ने मिलकर यह सोचा और एहसास किया कि अन्तिम दौड़ इससे भी अच्छी तरह से हो, इसलिए उन्होंने फिर अन्तिम दौड़ आयोजित करने का निश्चय किया। परंतु इस बार एक टीम की तरह दौड़ शुरू की और खरगोश नदी के किनारे तक कछुए को उठाकर लाया एवं नदी में कछुआ खरगोश को उठाकर नदी को पार कर गया। नदी के दूसरे किनारे पर खरगोश ने फिर से कछुए को उठाया और दोनों साथ मिलकर गन्तव्य स्थान तक पहुंचे। वे दोनों पहले की अपेक्षा इस बार बहुत अधिक खुश हुए।
संदेश: आप व्यक्तिगत रूप से प्रतिभावान और अपने क्षेत्र में कुशल होंगे। लेकिन जब तक आप एक टीम में रहकर एक दूसरे के गुणों के लाभ नहीं उठायेंगे, तब तक आप बहुत अच्छा काम नहीं कर पायेंगे। समूह में कार्य करने का मुख्य उद्देश्य परिस्थिति को संभालना एवं व्यक्ति में रही संबंधित प्रतिभा को उभारने के लिए सहयोग देना है।
आज समाज में हर व्यक्ति सफलता चाहता है, पर कहीं अपने आप में विश्वास नहीं। विश्वास है तो धीमापन है और अपनी क्षमता को पहचाने बिना कार्यक्षेत्र जो हाथ लगा उसमें कूद पड़ते हैं। यदि किसी भी संस्था में टीम वर्क अच्छा होगा तो सफलता के शिखर सर करने में सरलता रहती है। देश बहुत बड़ा है पर टीम वर्क का अभाव है। आपसी सद्भावना और विश्वास की कमी है। हर कोई अपने आप को श्रेष्ठ समझता है। प्रतिभावान होते हुए भी टीम के सहयोग द्वारा एक दूसरे के गुणों का लाभ नहीं उठायेंगे तो अच्छा काम करना संभव न होगा। कछुआ और खरगोश तो प्रतीक मात्र हैं। दोनों प्रकार के मनुष्य समाज में पाये जाते हैं।
मनुष्य को कुछ ऐसे भी सोचना चाहिए -
खरगोश और कछुए ने असफल होने पर भी कोशिश नहीं छोड़ी (कोशिश करने वालों की हार नहीं होती)। असफलता के बाद खरगोश ने आत्मचिंतन किया और निर्णय किया कि अपने कार्य में सफल होने के लिए उसे अधिक मेहनत और प्रयत्न करना होगा, सोच बदल कर। एक बार की निष्फलता सफलता की सीढ़ी बन सकती है। असफल होने पर आत्महत्या नहीं, ज्यादा मन लगाकर एकजुट होकर विश्वास से कदम बढ़ाओं। कछुआ दूसरी बार हारा लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने सफल होने के लिए अपनी नीति बदली। असफलता मिलने पर सिर्फ अधिक मेहनत ही काम नहीं आती। हमारी कार्य-पध्दति और तरीकों को बदलना होगा। बदलाव समय की मांग है। कई बार यह आवश्यक भी बन जाता है। अर्थात् पध्दति बदलो और प्रयत्न चालू रखो।
दोनों खरगोश और कछुआ न ही मित्र थे ना ही दुश्मन, लेकिन खरगोश और कछुए ने सोच मिलकर अच्छा कार्य किया। यदि हम आपस में नहीं बल्कि परिस्थति के सामने प्रतिस्पर्धा करेंगे तो परिस्थिति में सुधार होगा। और हमारा कार्य उत्कृष्ट होगा।
क्यों न हम शाला महाशालाओं में ऐसे प्रयत्न करें! और शत प्रतिशत सफलता हासिल करें।
आणंद एज्युकेशन कॉलेज, आणंद, गुजरात


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