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Sep 16 2008



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सम्पादकीय

नारी विमर्श -: समय की पुकार

आदि मानव में शायद मातृसत्ताक समाज का अस्तित्व था, जब नारी समग्र मानव समुदाय की नियंता थी, किन्तु आज इक्कीसवीं सदी में स्थितियाँ नितान्त भिन्न हैं। पुरूष पारिवारिक-सामाजिक-राजनीतिक सत्ता पर आज भी हावी है। इतना ही नहीं साँकृतिक स्तर भी उन्हीं परंपराओं का बोलबाला है जिनके अनुसार नारी मात्र पुरूष...


कविता


कहानी

नर्गिस

स्टेशन के लिए रवाना होने से पूर्व मैंने कई बार रेलवे इन्क्वायरी को फोन करके ट्रेन के आने का समय पूछा था। हर बार यही उत्तर मिला **ट्रेन राइट टाइम पर आ रही है।**
मुझे विस्मय हुआ था कि अक्सर विलम्ब से आने वाली गाड़ी उसी दिन सही समय से...


साहित्य विचार

हिन्दी नवगीत : स्वरूप, विकास और संभावनाएं

आधुनिक काल में साहित्य के क्षेत्र में जब भी नये प्रयोग हुए हैं, तो नई चेतना के अन्तर्गत परंपरागत विधाओं के नामकरण में भी अपेक्षित परिवर्तन का प्रश् उठना स्वाभाविक था। तदनुसार प्रत्येक विधा के आगे नव या नया-नयी जोड़कर उसे नई कविता, नई कहानी, नया नाटक आदि नाम दिये...


संस्कृति चिंतन

व्यक्ति के आंतरिक व्यक्तित्व

वैकल्पिक समाज संरचना की अवधारणा पूर्णत: विधायक है, निषेधात्मक नहीं। यह मानवीय चेतना के निरंतर गतिमान रहने के उपक्रम के परिपार्श्व में अधिक हृदयंगम बन सकती है। मानव जीवन तथा चराचर जगत का हर क्षण परिवर्तन से अनुप्राणित है। इस विचार दृष्टि से भी वैकल्पिक समाज रचना का विचार, उस...


जीवन विवेक

धन साध्य नहीं, साधन है

एथिक्स बहुत जटिल प्रश्न है। इसलिए है कि आज का सारा चिंतन पदार्थ जगत के साथ जुड़ा है। चेतना को आज बिल्कुल इग्नोर किया जा रहा है। जब तक चेतना और पदार्थ-इन दोनों को साथ में रखकर चिंतन नहीं करेंगे, समस्या का समाधान संभव नहीं लगता। इस विषय में भगवान...


ग्रंथावलोकन

सर्वजीवहितावह ग्रंथ : शिक्षापत्री

अभिनव गीता कहा जा सके ऐसा सर्वजीवहितावह ग्रंथ *शिक्षापत्री* स्वामिनारायण संप्रदाय का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। यद्यपि स्वामिनारायण संप्रदाय का मिशन आध्यात्मिक फलक से संबंधित है फिर भी वह समाज को नहीं भूला है। इसी बात का सचोट उदाहरण है *शिक्षापत्री*। भगवान स्वामिनारायण ने आचारशुध्दि, चरित्रशुध्दि, नैतिकता, स्वच्छता, व्यवहार, आदि...

संपादक

घनश्यामप्रसाद सनाढय







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